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केतु - कालसर्प का उपेक्षित प्राणी
केतु - कालसर्प का उपेक्षित प्राणी
पद्मा शर्मा
सब साँप के फन से डरते हैं और सभी सांपों को कोबरा समझते हैं और सब सांपों को जहरीला मानते हैं। इसमें पहली बात सच है और बाकी दोनों बातें झूठी हैं। सर्प के नाम से पक्का एक अज्ञात भय है और सर्प नाम की सत्ता अपने अस्तित्व से भी अधिक डराने में सफल हुई है। अब सवाल यह है कि डराता सांप है या मनुष्यक् किसको फायदा हैक् मनुष्य के सारे कारनामों में सांप की तो मौत होती है और कुछ लोगौं को लाभ होता है। किसको लाभ होता हैक् सांप की हड्डी, सांप के दांत, सांप की खोप़डी, सांप का विष, सांप की केंचुली और बहुत स्थानों पर सांप का केवल नाम। ख़डे-ख़डे अचानक बोल दीजिए- सांप! सांप! वहां ख़डे सबकी हालत खराब हो जाएगी और वहां से तितर-बितर हो जाएंगे। कोई एक नादान कहीं से डंडा लाएगा और बाकी बचे हुए में से कुछ बहादुर उस डंडे के पीछे पांत लगाकर ख़डे हो जाएंगे। सर्प के प्रशंसक वैज्ञानिक भी हैं परंतु उन्हें मरे सांप से फायदा होता है और कुछ तथाकथित ज्योतिषियों को कल्पना लोक के सर्प से। चाहे उसे कालसर्प का नाम दे दीजिए। कई बार लगता है कि ज्योतिष और सपेरे में भी मिलीभगत है। ज्योतिषी सांप छु़डवाता है और सपेरा वापिस ले आता है। उस बेचारे सांप को रोटी भी नसीब हुई है या नहीं, यह ना ज्योतिषी को पता है और ना ही सांप का दान करने वाले व्यक्ति को। पुण्य कमाने चले हैं और हासिल होता है फकत पाप! अपना-अपना मुकद्दर है। जो सांप भगवान की शैया है, जो सांप भगवान के गले में हैं, वह सांप जिसने मनुष्यों के कुछ सुखों पर कुण्डली मारी हुई है, उसके कुचले जाने पर सब प्रसन्न होते हैं। उसके रीढ़ होती तो क्या मनुष्य की इतनी हिम्मत होती?
ज्योतिषी भी फन से ही डरता है, उसी के ही गुण गाता है। कालसर्प की सृष्टि कर ली और केवल फन को चुना। केवल राहु की प्रतिष्ठा कर दी। यह भूल गया कि सर्प के पूंछ भी होती है। मगरमच्छ की पूंछ से तो डरते हैं, सांप की पूंछ क्या बिग़ाडेगीक् उसका फटकारा मनुष्य को ना गिरा सकता है, ना मार सकता है और ना जहर डाल सकता है। पर मैं समझती हँू कि ज्योतिषी या मनुष्य की सबसे ब़डी भ्रांति यही है। जिस कालसर्प की हम बात कर रहे हैं, उस सर्प की पूंछ का समीकरण हम केतु से करते हैं और केतु मनुष्य की सारी संपन्नता, सारे सुख और सारे पारलौकिक सुख का केन्द्र बिंदु हैं। उसकी उपेक्षा करेंगे तो कुछ नहीं मिलेगा। भला हो जैमिनि ऋषि का, जिन्होंने केतु को अत्यंत ऊंचा स्थान दिया है। उन्होंने केतु को बहुत शुभ ग्रह माना है। बहुत ब़डे ऋषि थे परंतु उन्होंने कालसर्प की फन और पूंछ जैसी कोई चीज नहीं मानी, परंतु आजकल के कुछ ज्योतिषी जैमिनि ऋषि से भी ब़डे हो गए लगते हैं।
गत वर्षो में मैंने मेरे पति श्री सतीश शर्मा के मुंह से सुनी है। एक तो वे अपने गुरू का उल्लेख करते हैं कि राहु वह भ्रमर (भंवर) है जिसमें यदि पत्ते को डाल दिया जाए तो वह घूम-घूमकर पानी में डूब जाएगा। इसे स्वर्गीय पंडित रामचंद्र जोशी राहु मानते थे। दूसरा भ्रमर वह है जिसमें पत्ता डाल दो तो घूमता हुआ पानी पत्ते को बाहर फेंक देता है। भारतीय फिल्मों में तो यह दूसरा भ्रमर ही मिलता है जिसमें हीरो सदा नदी किनारे फेंक दिया जाता है। पं. रामचंद्र जोशी इस दूसरे भ्रमर को केतु मानते थे। राहु संसार भंवर में फंसाता है, पुनर्जन्म का कारण बनता है और केतु मोक्ष दिलाता है। महान् ऋषियों की अवधारणाओं का कितना सुंदर और सरल विश्लेषण है।
 मेरे पति दूसरा उदाहरण भारत के प्रसिद्ध उद्योगपति ओ.पी. जिंदल का देते आए हैं जिसको उन्होंने 21 जीवित सांप छु़डवाने के लिए कहा था। जिंदल जी ने बताया था कि उन्हें 21 की संख्या पर आश्चर्य है। स्व. श्री जिंदल को किसी ने कहा था कि जितने सांप मारोगे, उतने ही धनी हो जाओगे। हम सभी मानते आए हैं कि राहु और केतु इस जन्म के और गतजन्म के बीच शुभ-अशुभ के सेतु हैं और उन्हें साधारण रूप में नहीं लिया जा सकता।
सांप की पूंछ या केतु
ज्योतिष मंथन संग्रहालय में ऎसी बहुत सी कुण्डलियां हंै जो केतु के महत्व को बताती हैं। जहां कहीं भी असाधारण प्रगति देखने को मिलती है - केतु का योगदान देखने में आता है। जिन कुण्डलियों में केतु के आस-पास कई ग्रह इकट्ठे हो तो यह माना जाता है कि वे समस्त ग्रहों की शक्ति को या तो अपने में समाहित कर देते हैं या उन्हें बाधित कर देते हैं। ज्योतिष ग्रंथों में मिलता है कि केतु जिस ग्रह के साथ बैठे हों, उस ग्रह का फल देते हैं। सूर्य के साथ स्थित रहकर केतु, सूर्य को इतना अधिक प्रभावित नहीं कर पाते जितना कि राहु कर पाते है। ज्योतिष ग्रंथों में राहु का नैसर्गिक बल सूर्य से अधिक माना जाता है परंतु वहां केतु का उल्लेख नहीं आता है। मेदिनी ज्योतिष में राहु और केतु को समानार्थक माना जाता है और इन दोनों में से कोई भी ग्रहण करा देेने में समर्थ है। कई बार तो राहु सूर्यग्रहण कराते हैं और 15 दिन बाद ही केतु चंद्रग्रहण कराते हैं। सूर्यग्रहण अमावस्या के दिन होता है और चंद्रग्रहण पूर्णिमा के दिन। चंद्रग्रहण राहु भी करा सकते हैं और केतु भी। वहां इन दोनों की शक्तियों में कोई भेद नहीं माना गया है और उन्हें समानधर्मा माना गया है परंतु जिन वराह मिहिर ने यह कहा है वे ही वराह मिहिर अपनी वृहत् संहिता में केतु के गुण भी गाते पाए गए हैं और उनकी संख्या बहुत अधिक बताई है।
 अस्तु केतु जी पूंछ हैं और ज्योतिषी पूंछ से कम डरता है। परंतु याद रहे जब केतु दुर्घटना कराएंगे तो व्यक्ति नीचे गिरेगा, स्कूटर उनके ऊपर सो जाएगा और व्यक्ति को दस-पांच मिनट बाद ही पता चल पाएगा कि हुआ क्या हैक् आकस्मिकता केतु का श्रेष्ठ लक्षण है। चाहे रिश्तों से मोक्ष हो, चाहे नौकरी से मोक्ष हो, चाहे परिवार से मोक्ष हो, चाहे धन-संपदा से मोक्ष हो और चाहे संसार भंवर से मोक्ष हो। सब-कुछ आकस्मिक होता है और व्यक्ति को ना तो वसीयत करने का चांस मिलता है और ना ही पत्नी से बात करने का चांस मिलता है और ना ही संपत्तियां कैसे बंटेंगी, इसका उल्लेख कर पाता है। अव्वल तो, वह कल्पना ही नहीं करता कि वह धरती से जा भी सकता है और जब जाता है तो उसे तो पता नहीं चलता और भूत-प्रेतों को कलपते हुए आजतक किसी ने देखा नहीं। एक फिल्मकार जरूर हैं, जिसका नाम तुलसी रामसे है और सबसे वाहियात भूत फिल्में भी वही बनाता है। उसकी भूतनी नायिकाएं मृत्यु के बाद भी अपने अपराधी खलनायकों के सोने के बाद अपने ब़डे-ब़डे नाखूनों वाले हाथ से डबलबैड की लक़डी चीरकर नीचे से ही खलनायक को पक़ड लेती हैं और उसे चीर डालती हैं। कालसर्प का शिकार भारतीय दर्शकों को बनना प़डता है और उनकी जेब खाली होती रहती है। क्या आश्चर्य है कि ज्योतिषी और तुलसी रामसे जैसे लोग भी एक ही पल़डे में बैठे हैं। अगर भारत के सेंसर बोर्ड में एक भी मेरे जैसा ज्योतिषी हो तो तुलसी रामसे पक्का बेरोजगार हो जाएगा। मैं जहां तक समझती हूं कि केवल एक फिल्म ऎसी आई है जो भारतीय दार्शनिक धरातल पर खरी उतरती है। वह है - लेकिन! लता मंगेतकर ने उसके संगीत में जैसे शताब्दी का संगीत डाल दिया हो। भूत फिलोसोफी पर यह अब तक की श्रेष्ठ फिल्म है। मेरे पति जिस दूसरी बात का बार-बार हवाला देते हैं वह उनकी अपनी शोध है। यदि बृहस्पति, केतु और धनु राशि में परस्पर संबंध हो जाए तो वह व्यक्ति धनी होने लगता है। यदि जीवनकाल में केतु की दशा आए तो महाधनी हो जाता है और अगर इन युतियों का लाभ भाव, आय भाव, लग्न, पंचम भाव या भाग्य भाव से संबंध हो जाए तो उसका टर्न-ओवर अचानक बहुत ऊंचा उठने लगता है। उनके क्लाइन्ट दिल्ली में बसे हुए श्री ओ.पी. अग्रवाल के लग्न में उच्चा के केतु हैं और जब केतु की महादशा आई तो उन सात वर्षो में गणपति एक्सपोर्ट का टर्न-ओवर 6हजार करो़ड से ऊपर पहुंच गया था, उन वर्षो में बिरला गु्रप का भी टर्न-ओवर इतना नहीं था।
ज्योतिषियों का एक वर्ग जन्मपत्रिका में केतु से सृष्टि की उत्पत्ति की गणना करता है। ऩाडी ज्योतिषियों में इस तरह की बातें देखने को मिलती हैं। मूल नक्षत्र केतु का नक्षत्र है और मूल गणनाओं में उन्हें श्रेष्ठ स्थान हासिल है। षष्ठचक्र भेदन पर जो लोग काम करते हैं वे मनुष्य के मेरूदण्ड के सबसे निचले भाग में मूलाधार चक्र की कामना करते हैं। मूलाधार चक्र कुण्डलिनी जागरण का सबसे प्रमुख स्थल है। चूंकि वह स्थान मेरूदण्ड की पूंछ हैं अत: उसका समीकरण चाहे सर्प की पूंछ से करें या मेरूदण्ड की पूंछ से करें, किसी ना किसी रूप में केतु के स्वरूप की याद दिलाते हैं। मेरूदण्ड की पूंछ या मूल नक्षत्र के नाम पर मूलाधार चक्र केतु के सृष्टि मूल की अवधारणा को भी पुष्ट करते हैं। जब केतु के पारलौकिक स्वरूप को देखते हैं तो यह केतु या मूल किसी भी फन या राहु से भी अत्यधिक शक्तिशाली प्रतीत होते हैं। ज्योतिष जगत के कुछ लोग कालसर्प के नाम से लोगोे को डराने में लगे हुए हैं और केवल राहु को पक़डे हुए हैं। केतु का कोई नाम ही नहीं लेता। यह केतु हैं जो मूलाधार चक्र के माध्यम से साधना किए जाने पर मनुष्य को मृत्यु भय से मुक्त करते हैं, मनुष्य को कालजयी और त्रिकालज्ञ बनाते हैं। जिस ज्योतिषी ने कुण्डलिनी जागरण कर ली तो उसे भूत, भविष्य और वर्तमान के लिए ना तो कोई गणना करनी प़डेगी और ना फिर कभी कोई कर्मो की विस्मृति होगी। कालसर्प के नाम से डराने की तो कभी कोई आवश्यकता ही नहीं प़डेगी।
यह लेख मैं इस क्रम में लिख रही हँू कि आने वाली दशाओं में से किसके बारे में बताया जाए। केतु के बारे में मैं बताने चली हंू पर केतु की व्यथा भी बता रही हँू। वे ज्योतिषी जो कालसर्प की पूजा कराकर धन-दोहन कर रहे हैं, वे पूजा पाठ में कभी भी 12 तरह के सर्पो का चक्र नहीं बनाते, जिस तरह का योग बनाते हैे उसी एक नाग का मंत्र पढ़ देते हैं। राहु का भी थो़डा बहुत मंत्र पढ़ देते हैं। केतु की ना तो मूर्ति गढ़ते हैं और ना ही मंत्र पढ़ते हैं। पूंछ की कोई चिंता नहीं। ऎसे ज्योतिषियों का केतु कभी भी मोक्ष नहीं होने देंगे। भारतीय आध्यात्म शास्त्र में मोक्ष के कारक केतु हैं, राहु नहीं, यह उन्हें याद रहना चाहिए।
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