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धन प्राप्ति
धन प्राप्ति
सतीश शर्मा
प्रत्येक व्यक्ति को धन चाहिए। बुजुर्ग कह गये हैं कि पहला सुख निरोगी काया पर लोगों को धन चाहिए बुजुर्गो ने यह भी कहा -
पूत सपूत तो को धन संचय।
 पूत कपूत तो को धन संचय।।
अर्थात् एक भी सुपुत्र हो तो धन संचय की आवश्यकता ही नहीं पडे़गी। यहाँ आकर पुत्र को धन के उपर मान्यता दी गई हैं। तुलसी दास ने कहा है कि हानि लाभ, जीवन-मरण, जस-अपजस, विधि हाथ। तुलसीदास ने धनार्जन को विधि पर छो़ड दिया। विधि का अर्थ है भाग्य पर गीता कुछ और कहती है-
कर्मस्य ही भाग्यफलम्।
अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण मानते हैं कि भाग्य कर्मो का ही फल हैं। इकटे कर्मो का। संचित कमोंü का। जन्म जन्मान्तर के अभुक्त कर्मो का। कालप्रमाण में हम गत जन्म में नहीं जा सकते हैं क्योंकि माया के कारण विस्मृति हो गई है। यदि हम वर्तमान भोगों को गत जन्म के कर्मो से पहचान पाते या गत कर्मो का कारण जान पाते तो हम समझ पाते कि कर्म ही भाग्यफल हैं। हम महीने भर काम करते हैं और एक तारीख को वेतन मिलने पर कहते हैं कि यह हमारा कर्म फल है और गत जन्म के कमोंü के कारण जो फल हमें इस जन्म में मिल रहे है उन्हें हम यह नहीं कहते कि यह भी हमारें कर्मो के फल हैं। किसी व्यक्ति को बहुत अधिक पी़डा हो जाये या गरीबी आ जाये तो वह अवश्य कहता है कि गत जन्मों में खराब कर्म किये होंगे।
मुझे कुछ ऎसी जन्मपत्रियां देखने में मिली हैं जो उच्चाकोटि की हंै और धनी व्यक्तियों की होते हुए भी उच्चाकोटि के संस्कारों को दर्शाती हैं। राजा जनक या परशुराम जैसे व्यक्तित्व राजा या ऋषि दोनों हुआ करते थे। इतने उच्चाकोटि के कर्म करने के बाद भी यदि मोक्ष ना हो और पुन:जन्म लेना प़ड जाये तो गत जन्म की तमाम सिद्धियाँ इस जन्म के ऎश्वर्य में बदल जाती हैं। आप कई बच्चाों में या युवाओं में जन्म से ही राजसी संस्कारों को देख सकते हैं। कई बच्चो हलके कार्य नहीं करते, कई बच्चो बचपन से ही स्वाभिमानी होते हैं, कई बच्चाों का रहन-सहन और पहनावा तथा भोजन ग्रहण करने की कला आभिजात्य वर्ग के व्यक्तियों की तरह होती है। गरीब घरों में जन्मे बच्चो भी ऎसा करते पाये जाते हैं। इस का धन से कोई सम्बन्ध नहीं है। वे गत जन्म की स्मृतियों को भोगते हुए पाये जाते हैं।
आधुनिक भौतिकी का ऊर्जा के संरक्षण का सिद्धान्त हमें याद रखना चाहिए। ऊर्जा नष्ट नहीं होती बल्कि रूप बदल लेती है। कर्म भी ऊर्जा का समानार्थक है। कर्म रूप बदल लेता है परंतु नष्ट नहीं होता है। गीता का यही कहना है कि जिसने कर्म किया है उसे भोगना ही प़डेगा और समस्त कर्मो को भोगकर शून्य स्थिति में लाये बिना मोक्ष हो नहीं सकता।
 कर्म धन में बदलते हंै या राजयोग में बदलते हैं या शारीरिक सुख में बदलते हैं या अन्य किसी ऎश्वर्य में बदलते हंै या दु:खों में बदल जाते हंै, इसका दिग्दर्शन या तो वही कर सकता है जिसे तीनों काल का ज्ञान हो या वह कर सकता है जिसे ज्योतिष जैसी पद्धति का ज्ञान हो। यही कारण है कि ज्योतिष में विभिन्न भोगफल को पहचानने के लिए योगों की सृष्टि की गई है। यह कमोंü के फलन की प्रकृति पर आधारित है और ग्रह नक्षत्रों को इन कर्मों के फल को ज्ञात करने का गणना आधार बनाया गया है। जो यह समझते हैं कि ज्योतिष शुद्ध खगोलशास्त्र पर आधारित है वे गलती पर हैं। धर्म, आध्यात्म, कर्मवाद, और ज्योतिषगणना सब मिलकर ज्योतिष्ा की आधार पृष्ठभूमि बनाते हैं और ज्योतिषी इनके आधार पर धन या राजयोग का निर्णय करते हैं।
राशिचक्र के कुछ खास हिस्से में ही धन नहीं होता। यह लगA है जो धन भाव को तय करके यह बताता है कि किसी खास लगA में राशिचक्र के किस भाग से धन प्रवाह आयेगा। यदि हम कालपुरूष के धनभाव को ही धनप्रवाह का माध्यम मानें तो एक ब़डी गलती हो जायेगी। जैसे ही लगA बदलती है हमें पता चलता है कि कालपुरूष के धन भाव के अतिरिक्त अन्य कोई भी भाव या राशि धन प्रदायक हो सकती है। इसलिए राशिच्रक का नक्षत्र क्रम को आविष्कार भारतीय ज्योतिषियों की अद्भुत खोज है जिसका मुकाबला पाpात्य ज्योतिष आज तक भी नहीं कर पायी है। दूसरा आpर्य इस बात का है कि हम जन्मपत्रिका देखते ही इस बात का पता लगा लेते हंै कि व्यक्ति के धन का स्तर क्या है। मैंने स्वयं ने जीवन के 25 महत्वपूर्ण वर्ष इस खोज में गंवा दिये जिसके अन्तर्गत मैं भूखण़्ड से ही उसके स्वामी के धन का स्तर या किसी फैक्ट्री से उसके मालिक के टर्नओवर का अनुमान लगा लेता हूँ। शुभ और अशुभ धन का भी पता आसानी से लगाया जा सकता है। इस लेख में मैं कुछ ऎसी चर्चा करूंगा जिसमें अति धन या बहुत धन या अच्छे-बुरे धन की पहचान जन्मपत्रिकाओं या वास्तुखण्ड के आधार की जा सके।
जैमिनी ज्योतिष: जैमिनी ऋषि ने आत्मकारक से लाभ भाव में शुभ और अशुभ राशि को अधिक महत्व दिया है। उनका कहना है कि लाभ भाव में शुभ राशि हो तो शुभ मार्ग से धन आयेगा तथा यदि अशुभ राशि हो तो अशुभ कार्यों से धन लाभ होगा। यदि लाभ भाव में शुभ ग्रह बैठे हों तो शुभ मार्ग से धन आयेगा और पाप ग्रह बैठे हो तो पाप मार्ग से धन आयेगा। यदि शुभ और पाप दोनों तरह के ग्रह बैठे हो तो शुभ और पाप दोनों मार्गो से धर्नाजन होगा। भारतीय परम्परा में शुभ, लाभ की ही कामना की गई है तथा घर और दरवाजों पर शुभ-लाभ ही लिखा जाता है। अशुभ से तात्पर्य गैरकानूनी और अधर्म के मार्ग से कमाया गया धन है। ऎसा धन वंश को आगे नहीं बढ़ायेगा और कुल का पतन करा देगा ऎसी मान्यता है। चोरी, शोषण, जुआ, सट्टा, लॉटरी, स्मगलिंग व अनुचित साधन अपनाकर अर्जित किया गया धन अशान्ति व पतन को शीघ्र ही ला देता है।
मान लीजिए एकादश भाव में मीन राशि है या कारकांश लगA से एकादश में मीन राशि है। इसका अर्थ यह निकला कि उसके आजीविका के साधन पवित्र ही रहेंगे। इसी प्रकार यदि एकादश भाव में वृश्चिक या कुंभ राशि हुई तो आजीविका के साधनों में अपवित्र अंश भी हो सकते हैं। यदि एकादश भाव में राहु हो तो व्यक्ति धन साधन के लिए जो़ड-तो़ड, तिक़डम का सहारा लेगा। यदि एकादश भाव में शनि हुए ता व्यक्ति आजीविका के लिए अधिकार क्षेत्रों का अतिक्रमण भी करेगा और अनुचित आय कर सकता है। आय का उचित होना या अनुचित होना एक बहस का विषय हो सकता है परन्तु शोषण से प्राप्त आय को भी अनुचित की श्रेणी में रखा जा सकता है। जहाँ तानाशाही हो, जहाँ पूँजीवाद हो वहां प्रच्छन्न रूप से अशुभ आय देखने को मिल सकती है।
ज्योतिष के जितने भी धन योग हैं उनमें विरासत से हुई आय या आकस्मिक साधनों से हुई आय को शुद्ध भाग्य के रूप में देखा जा सकता है। पूर्वजों के किये गये पुण्य कमोंü से जो आय होती है वह व्यक्ति के स्वयं के कर्मौं से की गई आय से अधिक होती है। अत: उसके बिखर जाने का खतरा होता है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कहावत है कि "चोरी का माल मोरी में" या हराम की कमाई नाली में। विरासत में मिली सम्पत्ति न तो चोरी की होती है और ना हराम की क्योंकि पुत्र या पौत्र के होने के अधिकार से वह सम्पत्ति मिलती है। यहाँ यह संभव है कि जिसे वह सम्पत्ति या धन विरासत में मिला है वह उसकी स्वयं की धारण क्षमता से अधिक हो और इस कारण से यदि पर्याप्त तपोबल नहीं हुआ तो सम्पत्ति के नष्ट हो जाने या व्यय हो जाने का खतरा बना रहता है।
अष्टम भाव: इक्ट्ठा धन दिलाने में अष्ठम भाव की ब़डी भूमिका है। अन्य भावों के फल नष्ट करने में भी अष्टम भाव के स्वामी की भूमिका रहती है। अष्टमेश जिस भाव में बैठेंगे उस भाव के फलों में कमी आयेगी या किसी भाव का स्वामी अष्टम भाव में स्थित हों तो भी उस भाव के फलों में कमी आयेगी। उच्चाकोटि की विद्या, उच्चाकोटि का आध्यात्म, उच्चाकोटि की धन प्राçप्त बलवान अष्टम भाव के बिना संभव नहीं। अष्टम भाव तथा षष्ठम भाव सफलताओं के लिए स्पी़ड-ब्रेकर का काम करते हैं। जुआ, सट्टा, लॉटरी या स्मगलिंग से होने वाली आय अष्टम भाव के प्रभावों से देखी जा सकती है। अष्टम भाव को शुभ अथोंü में कम लिया जाता है अशुभ अर्थो में ज्यादा लिया जाता है।
पंचम भाव: महापुरूषों की जन्मपत्रिकाओं में प्राय: देखने में आता है कि पंचम भाव में कम अष्टक वर्ग बिन्दु होते है। अगर वे मोक्ष की तरफ बढ़ रहे हों तो कर्म क्षय होने के कारण अष्टम वर्ग बिन्दु कम मिलते हैं। यदि अधिक बिन्दु हों तो इसका मतलब कर्म संचय काफी बकाया है और वह भौतिक सम्पदा के रूप में इस जन्म में परिवर्तित हो जाने वाले हैं। अर्थात् भोग और ऎश्वर्य मिलने वाला है। अगर अष्टक वर्ग बिन्दु कम होंगे तो इसका अर्थ यह है कि इस जीवन में ऎसी दुर्घटनाऎं आयेंगी जो व्यक्ति को विरक्ति के मार्ग पर ले जायेंगी। महात्मा गांधी के पंचम भाव में 23 बिन्दु थे जो कि औसत से बहुत कम है। स्वामी विवेकानन्द के पंचम भाव में 21 बिन्दु थे, जबकि जवाहर लाल नेहरू के 28बिन्दु थे। इंदिरा गांधी के पंचम भाव में भी 28बिन्दु है जिसका सीधा सा अर्थ है कि महात्मा गांधी और विवेकानन्द को पुन: जन्म नहीं लेना प़डेगा। जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के पुनर्जन्म की संभावना बनती है। धन और सत्ता के प्रति आसक्ति पंचम भाव की समृद्धि या अधिक भाव बल या उसके स्वामी के अधिक ष्ाड्बल से ज्ञात किया जा सकता है। पंचमेश का स्वराशि में होना या उच्चा राशि में होना धन की निशानी है।
पंचमेश की दशा महादशा में विरासत की सम्पत्ति मिलती है। पिछले जन्म से सम्बन्धित लोग भी इस जन्म में मिलते हैं। पंचम भाव से प्राप्त होने वाली आय सदा शुभ मानी जाती है क्योंकि शुभ कमोंü का फल ही मानी जाती है। परन्तु यह मानना गलती होगा कि पंचम भाव जो कि समस्त संचित कर्मो का आश्रय स्थल है, से शुभ आय ही होगी। यदि गत जन्म में पाप कर्म नहीं हुए होते तो पुर्नजन्म क्यों हुआ होता। अत: इस भाव का विश्£ेषण बहुत सावधानी से करना जरूरी है फिर भी यह माना जा सकता है कि सामान्य से अधिक आय यदि देखनी हो तो पंचम भाव पर दृष्टि डालनी ही प़डेगी।
 द्वितीय भाव: द्वितीय भाव इस जन्म की समस्त संचित सम्पत्तियों को दर्शाता है। स्त्री धन, रिजर्व धन, चल-अचल सम्पत्तियों का संग्रह इत्यादि दूसरे भाव से देखे जाते हैं। चूंकि वाणी का भी यही भाव है इसलिए इस भाव का बलवान होना साहित्य, कला, संगीत इत्यादि से ब़डा धन उत्पन्न होना बताते हैं। जो लोग अपने वाक् कौशल से कमाते हैं उन पर दूसरे भाव के स्वामी की कृपा होती है और इस जन्म की मेहनत से ही कमाते हैं।
एकादश भाव: कालपुरूष के अगिAकोण में एकादश भाव स्थित होता है। गत जन्म के अभुक्त कर्मो का परिपाक इस जन्म में होता है और उसका अगिA से सम्बन्ध हंै। अगिAकोण से उद्दीप्त कर्म-अगिA इस जन्म के आवेशों का कारण बनती है और व्यक्ति धन संचय के लिए तरह-तरह के उपाय काम में लेता है। उस अगिA को दिशा देने का काम ग्रह करते हैं। सम्भवत: जैमिनी प्रभृति ऋषियों ने इस बात को पहचान लिया था और इसलिए उन्होंने इसका विश्£ेषण भी किया। इस भाव से आया हुआ धन दूषित माना गया है और पतन के मार्ग को सुनिश्चित करता है। कुल वृद्धि की अवरोह प्रक्रिया यहां से शुरू होती है। एकादश भाव के स्वामी की दशा में व्यक्ति ऎसे कार्य शुरू करता है जिससे वंश पतन का मार्ग खुल सकता है।
धन का शुभ और अशुभ होना:
अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दश वष्ााüणि तिष्ठति।
प्राप्ते एकादशे वर्षे समूलं च विनश्यति।।

अन्याय से कमाया हुआ धन दस वर्ष से अधिक नहीं टिकता है। चाणक्य ने कहा कि मूल धन के साथ ग्यारवें वर्ष नष्ट हो जाता है।
श्£ोक इस प्रकार है:-
अभयं सव संशुद्धि : ज्ञानर्योग व्यवस्थिति:।
दानं दमp यज्ञp स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।

अभय मन, वचन, कर्म की शुद्धि व ज्ञान योग की साधना मान पर नियंत्रण, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और आर्जव यह सब दैवीय सम्पदा कहलाता है।
टेढ जानि बंदइ सब काहू।
बक्र चन्द्रमहि ग्रसई न राहू।।
कुटिल व्यक्ति से सम्पदा कमाना ब़डा कठिन है। टेढ़़े व्यक्ति की सब वन्दना करते है। टेढे़ अर्थात् वक्र चन्द्रमा को तो राहु भी नहीं डसता है। सम्मान के साथ धन प्राप्त होना बहुत ब़डी बात है। अवज्ञा से प्राप्त होने वाले धन को साधु भी ठुकरा देता है। साधु से अर्थ स”ान या स्वाभिमानी व्यक्ति है।
अवमानेनागतमैश्वर्यमवमन्यते साधु:।
शायर अमीर ने कहा है कि :
 किसी रईस की महफिल का जिक्र क्या है अमीर।
खुदा के घर भी ना जायेंगे, वे बुलाये हुए।।

धन को लेकर एक और भी उक्ति है। केवल धन की कामना करने वाले अधम होते हैं। धन और मान दोनों की कामना करने वाले मध्यम होते हैं। केवल मान चाहने वाले उत्तम होते हैं क्योंकि मान ही सबसे ब़डा धन है।
दशम भाव:
लगभग सभी दर्शनों में दशम भाव से तात्पर्य क्रियमाण या संचियमान कर्मो से लगाया जाता है। यह वह कर्म हैं जिनमें परिवर्तन करने की आज्ञा ईश्वर की कृपा से मिल सकती है। कर्मो पर नियंत्रण, कर्मो की गति और कमोंü की प्रकृति इस भाव के स्वामी से जानी जा सकती है। दशम भाव का बलवान होना इस बात का प्रतीक है कि उसे धन तो मिलेगा परन्तु अधिकार के साथ। अत: अधिकार लिप्सा भी यहां देखी जा सकती है। इस भाव का बलवान होना ही सफलता की निशानी मानी जाती है और समाज और राष्ट्र में व्यक्ति को पहचाना जा सकता है। दशम भाव से प्राप्त धन व्यक्ति के अगले जीवन का मार्ग भी तय करता है क्योंकि मृत्युपरान्त इस जन्म के संचियमान कर्म अगले जन्म के संचित कमोंü में बदल जाते है।
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