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शनि से जु़डे पौराणिक आख्यान - पं. ओमप्रकाश शर्मा
शनि और श्रीगणेश जी
श्रीगणेश जी का ध़ड भाग तो मनुष्य का है किन्तु मस्तक (कंठ के ऊपर का भाग) हाथी का है और वे नागानन या गजानन कहलाते हैं। गणेश जी का मस्तक हाथी का ही क्यों हैक् इस प्रसंग में पुराणों में अन्यान्य कथाएँ उपलब्ध हैं, उन कथाओं में से एक कथा के अनुसार शनि देव की तिरछी दृष्टि के कारण ही ऎसा हुआ।
 शिवलोक में माता पार्वती पुण्यक व्रत के प्रभाव और श्रीहरि विष्णु के आशीर्वाद से एक पुत्र की माँ बनीं। पुत्र प्राçप्त के सुअवसर पर शिवलोक में मांगलिक उत्सव का आयोजन हुआ। जिसमें सभी देवी-देवता आए और सभी ने बालक के जन्म की प्रसन्नता में यथारूचि वस्तुओं का मुक्त हस्त से दान किया, तत्पश्चात् सुन्दर शिवपुत्र का दर्शन किया। सभी देवता आनन्द मग्न थे और शिशु की मंगल कामना कर रहे थे। देव समुदाय में एक ओर से सूर्यपुत्र, शनिदेव भी बालक की दीर्घायु की कामना रखे, गर्दन नीची झुकाए आए। शनिदेव अत्यन्त शांत मुद्रा में, श्रीकृष्ण के ध्यान में मग्न थे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने भगवान शंकर, विष्णु, ब्रrाा, धर्म, सूर्य और अन्य देवगणों को प्रणाम किया फिर उनकी आज्ञा लेकर वे बालक के दर्शन करने गए। महल के अंदर पहँुचकर उन्होंने सर्वप्रथम सिर झुकाकर माँ पार्वती को प्रणाम किया, उस समय उन्होंने बालक को गोद में ले रखा था और वे उसे दुलार रही थीं। माँ पार्वती ने शनिश्चर को आशीर्वाद दिया और कुशलक्षेम पूछने लगीं। उन्होंने कहा - सूर्यपुत्र, अपनी गर्दन क्यों झुका रखी हैक् मेरी व मेरे पुत्र की ओर देखो, तुम मेरे पुत्र को देख क्यों नहीं रहे हो?
 इस पर शनिदेव ने कहा कि- "माते! मेरा नहीं देखना ही अच्छा है, क्योंकि सभी प्राणी अपनी करनी का फल भोगते हैं। मैं भी अपनी करनी का फल भोग रहा हूँ।"
 तब शनिदेव कर्मयोग की प्रशंसा एवं कर्मो की सारगर्भिता व आवश्यकता को बताते हुए कहने लगे - "हे माते! एक घटना का वर्णन करता हँू, यद्यपि वह ल”ाावश माता के समक्ष कहने योग्य नहीं है, तथापि आपके आदेशानुसार कहता हँू।"
माता - मैं बाल्यकाल से ही श्रीकृष्ण का भक्त हँू। उनकी आराधना किया करता हँू, मेरा मन सदा श्रीकृष्ण में ही निरत रहता है। मैं संसार के भौतिक विषयों से विरक्त होकर, सदा उन्हीं के ध्यान में मग्न रहता हँू। मेरे पिता सूर्यदेव ने मेरा विवाह चित्ररथ की कन्या से सम्पन्न कर दिया। वह सत्यनिष्ठ, धर्मज्ञ और पतिपथानुगामिनी थी। एक दिन ऋतुकाल में, शुद्घ स्नान करके मेरे समीप आई, किंतु मैं श्रीकृष्ण के ध्यान में मग्न था, अधिक समय तक प्रतीक्षा करते-करते जब ऋतुकाल निष्फल हो गया तो मेरी पत्नी ने भावावेश में आकर मुझे शाप दे दिया कि - तुम जिसकी ओर देखोगे वह नष्ट हो जायेगा जब मैं ध्यान से विरत हुआ, तब मैंने उस सती को संतुष्ट किया, किन्तु अब वह मुझे शाप मुक्त नहीं कर सकती थी, सो पश्चाताप करने लगी। माता इसी कारण मैं गर्दन उठाकर नहीं देख रहा हँू क्योंकि मेरी दृष्टि ही घातक है। शनिदेव की ऎसी बातें सुनकर रनिवास की çस्त्रयाँ हँसने लगीं।
 माँ पार्वती अपना उपहास समझते हुए और शनिदेव की दृष्टि के कुप्रभाव को निस्सार समझते हुए कहने लगीं - शनि, ये मेरा पुत्र है, जिसको सभी देवताओं ने आशीर्वाद प्रदान किया है और इसने मेरा दूध पिया है। तुम इस बालक को इतना सामान्य समझ बैठे। तुम देखो, मेरे पुत्र को कुछ नहीं होगा। होनहार बलवान होता है, शनिदेव ने जैसे ही गर्दन ऊँची उठाई और बालक को देखा ही था कि बालक का सिर ध़ड से अलग हो गया और ब्रrााण्ड में विलीन हो गया। शिव लोक में हाहाकार मच गया। माँ पार्वती बालक का खून से लथपथ शरीर गोदी में देखकर, उसे सीने से लगाकर करूण विलाप करने लगीं और मूच्छिüत हो गई। सभी देवी-देवता आश्चर्यचकित होकर असमंजस में प़्ाड गये। तभी भगवान विष्णु, गरू़ड पर आसीन होकर, उत्तर दिशा में पुष्पभद्रा नदी के तट पर गये। वहाँ उन्होंने देखा कि एक हथिनी अपने नवजात शिशु को लेकर उत्तर दिशा में सिर करके सो रही थी, विष्णु भगवान ने शीघ्र ही सुदर्शन चक्र से नवजात गज शिशु का मस्तक काट लिया और शिवलोक पहँुचकर बालक के सिर विहीन ध़ड पर जो़ड दिया। इसलिए नवजात शिशुओं या दूध मँुहे बच्चाों को लेकर उनकी माताओं को कभी भी उत्तर दिशा में सिर करके नहीं सोना चाहिए।
बालक जीवित हो गया। माता पार्वती को होश आया तो शनि देव को शाप दे दिया किन्तु सभी देवताओं ने शनि का पक्ष लिया और कहा कि इन्होंने अपनी सारी व्यथा आपको बता दी थी किन्तु आपकी जिद पूरी करने हेतु ही इन्होंने आपके पुत्र को देखा। इसमें इनका कोई कसूर नहीं है। तब माता पार्वती ने शनि को क्षमा कर दिया और शाप को एक पैर की विकलता के रूप में परिवर्तित कर दिया। इस तरह गणेशजी के गजानन होने में भी शनि का विशेष संबंध है।
शनि और रावण
आसुरी संस्कृति में महान् व्यक्तित्व उत्पन्न हुए, जिनका बल-पौरूष और विद्वत्ता अतुलनीय रही थी। शुम्भ-निशुम्भ, मधु-कैटभ, हिरण्यकश्यप, बलि या रावण, सभी अतुल पराक्रमी और महा विद्वान थे। यह अलग बात है कि उन्होंने अपनी शक्तियों का प्रयोग असामाजिक कृत्य और भोगों की प्राçप्त हेतु किया।
 इनमें रावण का नाम असुर कुल के विद्वानों में अग्रणी रहा है। रावण चूंकि ब्राrाण वंश में उत्पन्न हुए। उनके पिता ऋषि विश्रवा और दादा पुलस्त्य ऋषि महा तपस्वी और धर्मज्ञ थे किन्तु माता असुर कुल की होने से इनमें आसुरी संस्कार आ गए थे। ऋषि विश्रवा के दो पत्नियाँ थीं। एक का नाम च्च्इडविडाज्ज् था जो ब्राrाण कुल से थीं और जिनके कुबेर और विभीषण, ये दो संतानें उत्पन्न हुई। दूसरी पत्नी का नाम च्च्कैकसीज्ज् था, जो असुर कुल से थीं और इनके रावण, कुंभकर्ण और सूर्पणखा नामक संतानें उत्पन्न हुई।
कुबेर इन सब में सबसे ब़डे थे और रावण विभीषणादि जब बाल्यावस्था में थे, तभी कुबेर धनाध्यक्ष की पदवी प्राप्त कर चुके थे। कुबेर की पद-प्रतिष्ठा से रावण की माँ ईष्र्या करती थीं और रावण को कोसा करती थीं। रावण के मन को एक दिन ठेस लगी और अपने भाइयों (कुंभकर्ण-विभीषण) को साथ में लेकर तपस्या करने चला गया। रावण का भातृ प्रेम अप्रतिम था। इनकी तपस्या सफल हुई और तीनों भाइयों ने ब्रrााजी से स्वेच्छापूर्ण वरदान प्राप्त किया।
 रावण इतना अधिक बलशाली था कि सभी देवता और ग्रह-नक्षत्र उससे घबराया करते थे। ऎसा पढ़ने को मिलता है कि रावण ने लंका में दसों दिक्पालों को पहरे पर नियुक्त किया हुआ था। रावण चूंकि ब्राrाण कुल में जन्मा था सो पौरोहित्य कर्म में पूर्ण पारंगत था। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि शिवजी ने लंका का निर्माण करवाया और रावण ने उसकी वास्तु शांति करवाई, नगर-प्रवेश करवाया और दक्षिणा में लंका को ही मांग लिया था तथा लंका विजय के प्रसंग में सेतुबन्ध रामेश्वर की स्थापना, जब श्रीराम कर रहे थे, तब भी मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा आदि का पौरोहित्य कार्य रावण ने ही सम्पन्न करवाया।
रावण की पत्नी मंदोदरी जब माँ बनने वाली थी (मेघनाथ के जन्म के समय) तब रावण ने समस्त ग्रह मण्डल को एक निश्चित स्थिति में रहने के लिए सावधान कर दिया। जिससे उत्पन्न होने वाला पुत्र अत्यंत तेजस्वी, शौर्य और पराक्रम से युक्त हो। यहाँ रावण का प्रकाण्ड ज्योतिष ज्ञान परिलक्षित होता है। उसने ऎसा समय (मुहूर्त) साध लिया था, जिस समय पर किसी का जन्म होगा तो वह अजेय और अत्यंत दीर्घायु से सम्पन्न होगा लेकिन जब मेघनाथ का जन्म हुआ, ठीक उसी समय शनि ने अपनी स्थिति में परिवर्तन कर लिया, जिस स्थिति में शनि के होने पर रावण अपने पुत्र की दीर्घायु समझ रहा था, स्थिति परिवर्तन से वह पुत्र अब अल्पायु हो गया।
रावण अत्यंत क्रोधित हो गया। उसने क्रोध में आकर शनि के पैरों पर गदा का प्रहार कर दिया। जिससे शनि के पैर में चोट लग गयी और वे पैर से कुछ लाचार हो गये, अर्थात् लँग़डे हो गये।
शनि देव ही आयु के कारक हैं, आयु वृद्घि करने वाले हैं, आयुष योग में शनि का स्थान महत्वपूर्ण है किन्तु शुभ स्थिति में होने पर शनि आयु वृद्घि करते हैं तो अशुभ स्थिति में होने पर आयु का हरण कर लेते हैं। मेघनाथ के साथ भी ऎसा ही हुआ। मेघनाथ की पत्नी शेषनाग की पुत्री थी और महासती थी। मेघनाथ भी परम तेजस्वी और उपासना बल से परिपूर्ण था। इन्द्र को भी युद्घ में जीत लेने से उसका नाम
इन्द्रजीत प़ड गया था लेकिन दुर्भाग्यवश लक्ष्मण जी के हाथों उसकी मृत्यु हो गई।
इस प्रसंग में शनिदेव आयु के कारक और नाशक होते हैं, यह सिद्घ होता है।
राजा दशरथ द्वारा शनि की संतुष्टि
राजा दशरथ को कौन नहीं जानता, जिनके श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुƒन जैसे पुत्र हुए। ईश्वर ने साक्षात्, जिनके पुत्र रूप में जन्म लिया, जो रघुवंश के महाप्रतापी चक्रवर्ती सम्राट थे, जिनके शासनकाल में सुराज्य और पूर्ण सुव्यवस्था थी। एक बार राज ज्योतिषियों ने ग्रह गणित के द्वारा ज्ञात किया कि शनिदेव-कृत्तिका नक्षत्र के अंतिम भाग में चल रहे हैं और रोहिणी नक्षत्र में आने वाले हैं। शनि देव सभी देवताओं में प्रसिद्घ कालरूपी महान ग्रह हैं। इनका स्वरूप ब़डा विकराल है तथा दानवों को भी भय पहुँचाने वाले हैं। ज्योतिषी ने शनि के रोहिणी नक्षत्र पर आने के दुष्परिणामों से राजा दशरथ को अवगत कराया, कहा कि-महाराज! शनि, रोहिणी नक्षत्र का भेदन करेंगे, यह शकट-भेदन नामक महा अशुभ योग घटित होने जा रहा है, यह योग देवताओं और दानवों सभी को समान रूप से अनिष्टकारी है। कोई भी ग्रह जब वृष राशि के 17वें अंश पर स्थित होता है और उसका दक्षिण शर 2 अंश से अधिक हो जाता है तो वह रोहिणी का भेदन कर देता है। इस समय शनि इसी स्थिति में आने वाले हैं। यदि शनि, रोहिणी का भेदन करेंगे तो आगे बारह वर्षो तक घोर अकाल और अनावृष्टि होगी जिससे भयंकर दुर्भिक्ष फैलेगा। ऎसा सुनकर राजा दशरथ अपने गुरू वशिष्ठ तथा अन्य विद्वतवर्ग तथा मंत्रियों से विचार विमर्श करने लगे और पूछा कि -द्विजवरों ! बताइये इस संकट से निवारण का क्या उपाय हैक् तब वशिष्ठ जी ने कहा- महाराज! रोहिणी नक्षत्र, जिसके स्वामी प्रजापति ब्रrाा जी हैं, इस नक्षत्र का वेध हो जाने पर प्रजा कैसे सुखी रह सकती हैक् ब्रrाा जी और इन्द्र के लिए भी यह योग कष्टकारी है। तब राजा दशरथ साहसपूर्वक अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र और धनुष को लेकर रथ पर आरूढ़ हुए और नक्षत्र मंडल में जा पहुँचे। रोहिणी पृष्ठ सूर्य से सवा लाख योजन ऊपर स्थित है। वहाँ पहुँचकर राजा दशरथ ने अपने धनुष पर संहारास्त्र का संधान किया। इस अस्त्र के प्रभाव से सुर और असुर सभी भय खाते हैं।
दशरथ को देखकर शनिदेव हँसते हुए बोले - राजा दशरथ तुम्हारा पुरूषार्थ और पराक्रम अत्यंत प्रशंसनीय है। तुम्हारा साहस बडे़-बडे़ शत्रुओं को भी भय देने वाला है। मेरी दृष्टि जिस किसी पर प़्ाड जाती है, उसे अनिष्ट होता है। देवता, असुर, मनुष्य, सिद्घ, विद्याधर और नाग जिस पर भी दृष्टि प़डती है वह भस्म हो जाता है किन्तु तुम बच गये, अत: राजन् तुम्हारे तेज और पराक्रम से मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो, तुम जो भी मन से माँगोगे, मैं अवश्य दूँगा।
राजा दशरथ ने कहा- शनिदेव जब तक नदियाँ हैं और समुद्र हैं, जब तक सूर्य और चंद्रमा सहित पृथ्वी विद्यमान है, तब तक आप रोहिणी का भेदन करके आगे न बढे़ं। साथ ही कभी बारह वर्षो का दुर्भिक्ष और अनावृष्टि न करें, तो शनिदेव ने कहा कि ऎसा ही होगा।
ऎसा सुनते ही राजा वर प्राप्त कर प्रसन्न हो गये और धनुष बाण नीचे रखकर शनिदेव की स्तुति करने लगे।

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम:

 नमो निर्मासदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।

नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरभयाकृते

 नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णे च वै पुन:।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोùस्तु ते

 नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नम:।
 नमो घोराय रौद्राय भीषणाय करालिने

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोùस्तु ते।
 सूर्यपुत्र नमस्तेùस्तु भास्करे भयदाय च

 अधोदृष्टे नमस्तेùस्तु संवर्तक नमोùस्तु ते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निçस्त्रंशाय नमोùस्तु ते

 तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:

 ज्ञानचक्षुर्नमस्तेùस्तु कश्यपात्मजसूनवे।
 तुष्टो ददासि वै राज्यं रूष्टो हरसि तत्क्षणात्

 देवासुरमनुष्याp सिद्घविद्याधरोरगा:।
 त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:।
 प्रसादं कुरू मे देव वरार्होùहमुपागता:


 इस प्रकार राजा दशरथ की स्तुति से शनि और अधिक प्रसन्न हो गये और पुन: वर माँगने को कहा। तब राजा दशरथ ने अपने ज्योतिष्ा ज्ञान पर आधारित वर माँगा और वे कहने लगे-
शनि देव आज से आप किसी भी प्राणी, देवता, असुर, मनुष्य, पशु-पक्षी तथा नाग आदि को पी़डा नहीं देंगे तो शनिदेव ने आशीर्वाद देते समय कहा कि राजन्! मैं किसी व्यक्ति के जन्म लग्न या जन्म राशि में अथवा जन्म राशि से दूसरे, चौथे, आठवें और बारहवें भाव में जब रहूँगा तो उसे मृत्यु का कष्ट भी दे सकता हूँ किन्तु जो श्रद्घा-भक्ति पूर्वक, पवित्र और एकाग्रचित्त होकर मेरी लौहमयी सुन्दर प्रतिमा का शमीपत्रों से पूजन करेगा और तिल मिश्रित उ़डद-भात, चावल, लोहा, काली गाय अथवा काला बैल ब्राrाण को दान करेगा, विशेषत: शनिवार को तुम्हारे द्वारा रचित इस स्त्रोत का पाठ करेगा तथा मेरे मंत्र का जाप करेगा उसे मैं कभी पी़डा नहीं दूँगा।
जो कालवश मेरी पूजा अर्चना और दान-पुण्य तथा तुम्हारे द्वारा रचित इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसके गोचरवश जन
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