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केतु के चर और स्थिर कारकत्व - दीप्ति लालवानी कंगन
केतु ग्रह के कारकत्वों के विषय में अध्ययन करने से पूर्व हमें यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कोई भी ग्रह पत्रिका में जिस-जिस भाव का स्वामी बनता है वह ग्रह विशेष उस भाव के अधीन समस्त विचारणीय विषयों का भी कारकत्व प्राप्त कर लेता है।
 केतु के चर और स्थिर कारकत्वों के विषय में विभिन्न होराशास्त्रों में अध्ययन के फलस्वरूप यह पाया गया कि केतु के कुछ कारकत्व तो राहु के सदृश ही हैं। अधिकांश ग्रंथों में केतु के फलों का विवेचन कुजवत् केतु कहकर भी किया है अर्थात् केतु की विषयवस्तु मंगल ग्रह के समान ही है। जैमिनि ऋषि ने तो इस विषय में पाराशरजी से भी आगे जाकर मंगल की वृश्चिक राशि के दशा वर्ष तय करने में केतु को भी मंगल के समान माना है। इसी प्रकार जैमिनि ज्योतिष के कुछ नियमों में जहाँ रिश्तों की बात आती है, वहाँ केतु उन्हीं रिश्तों की मधुरता अथवा खटास के लिए उत्तरदायी होते हैं जो कि शुक्र से भी देखे जाते हैं।
ग्रंथकारों ने केतु के कारकत्वों के विषय में लिखा है कि केतु को ध्वजा कहा गया है। केतु चंचलता, गंगा स्त्रान, संकर जातियाँ (जो जाति परिवर्तन कर ले या हो जाए) के अधिष्ठाता, अंधेरा, वात प्रकृति आदि हैं। पत्रिका में यदि केतु शुभ हों तो मोक्ष मार्गी बनाने में सहायक हैं अत: ये धर्मात्मा भी हैं। वे आत्मज्ञानी, ब्रrाज्ञानी भी बनाते हैं। पशु-पक्षियों से यदि इनका संंबंध देखें तो उनमें साँप, कुत्ते, मेंढ़ा, भेç़डया, ऊँट, बकरा, गिद्ध, मुर्गा, मच्छर, खटमल, की़डे-मको़डे आदि से होता है। ये मौन व्रत के भी द्योतक हैं इसीलिए जैमिनि ज्योतिष में जब कारकांश या आत्मकारक के दूसरे भाव में केतु हों तो सभा ज़ड या अटक कर बोलने वाला होता है। इसी प्रकार से केतु के अन्य कारकों में नेत्र पी़डा, छिद्रयुक्त वस्त्र, चर्म रोग, शूल, क्षुधा (भूख), कंबल, कस्तूरी, तिल, तेल, रत्न, सुवर्ण, सप्तधान्य, कृष्णपुष्प, लोहा, रत्न, सुवर्ण, काले पुष्प, धूम्र सदृश्य नील शरीर आदि से संबंध रखते हैं।
 इन सब विषयों का विचार केतु की स्थिति के अनुसार जन्म लग्न और प्रश्न लग्न में पृथक-पृथक रूप से किया जाता है।
 केतु के विशेष कारकत्व : चर कारकत्वों में यदि जातक की पत्रिका से उसके परिवार एवं रिश्तेदारों के विषय में अध्ययन करें तो हम पाते हैं कि केतु जैसे नपुंसक ग्रह को स्त्री, माता, पिता, सास, ससुर, मातामह (नाना), दादा आदि का कारक माना गया है। पूर्व में हम लिख चुके हैं कि केतु को शुक्र के सदृश विशिष्ट पारिवारिक रिश्ते दर्शाने वाला माना गया है। केतु जन्मपत्रिका में यदि पीç़डत हों तो ये जातक की पत्नी और पुत्र के दु:ख का भी कारण बनते हैं। यदि जन्मपत्रिका के पंचम भाव में धनु या मीन, जो देवगुरू बृहस्पति की राशियाँ हैं उनमें केतु बैठ जाए तो ये ही केतु यहाँ पुत्रकारक के अनुरूप अपने परिणाम देते हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि पत्रिका में पुत्र, संतान, पद-प्रतिष्ठा इत्यादि, जितने भी पंचम भाव के विषय हैं उन सभी का अध्ययन हम केतु की स्थिति के आधार पर कर सकते हैं अर्थात् यहां केतु, बृहस्पति के सदृश फल देते पाए गए हैं।
इसी के विपरीत यदि केतु बुध की राशियों (मिथुन और कन्या) में बैठ जाएं तो ये अपने स्वभाव और गुणों से परे होकर विपरीत परिणाम देते हैं।
हम पहले ही कह चुके हैं कि केतु के फल मंगल सदृश होते हैं और मंगल, बुध के शत्रु माने गए हैं। वहीं केतु भी बुध की राशि मिथुन में नीच के हो जाते हैं इसीलिए ये बुध की राशियों में अपनी प्रकृति के विपरीत परिणाम देते हैं। शास्त्रों में केतु को सेना का स्थिर कारक माना गया है। केतु ध्वजा हैं, ये विजय के प्रतीक हैं।
आदिकाल से ही जितने भी युद्ध ल़डे गए हैं उनमें ऎसा कभी नहीं हुआ कि युद्ध में दोनों पक्षों की ओर से ध्वजा नहीं लहराई गई हो। चाहे वह राम-रावण युद्ध हो या फिर महाभारत का घोर विनाशकारी कौरव-पाण्डव युद्ध हो। महाभारत पर्व में आख्यान मिलता है कि पाण्डवों की ओर से जो ध्वजा अर्जुन के रथ पर लहरा रही थी उसमें महाबली हनुमानजी साक्षात् विराजमान थे। हम यहाँ यह कहना चाहते हैं कि सेना को नेतृत्व के लिए जिस ध्वज की जरूरत होती है वह ध्वज नवग्रहों में केतु का ही द्योतक है। यही ध्वज उस द्वन्द में दोनों पक्षों की हार या जीत का प्रतीक है। विद्वानों ने केतु को इष्ट व उपास्य देव कौन होंगे, इस विषय में उन्हें भगवान शिव, विष्णु एवं श्रीगणेश का तथा कठिन मार्गो का कारक माना है। शिव को केतु का कारक मानना कुछ अजीब सी बात लगती है परंतु शास्त्रों में लिखा है कि केतु सृष्टि का मूल हैं तो भगवान शिव भी सृष्टि के संहारकर्ता हैं। सारी सृष्टि भोलेनाथ से ही प्रकट होती है और उन्हीं में ही समाहित हो जाती है तो केतु को शिव साधना का कारकत्व मानना अतिशयोक्ति नहीं होगी। भगवान विष्णु भी जिस शेषशय्या पर लेटे हैं, उसका मूल भी केतु ही हैं।
शेषनाग का मुख राहु को माना गया है और उसका पुच्छ भाग केतु ही हैं। केतु को पाषाण, शूल, ब्राrाण व... शेष पृष्ठ 62 पर केतु के चर और  क्षत्रियों का विरोधी, शरीर में मलीनता के कारण उत्पन्न होने वाले रोग, पैर के रोग, चेचक, फो़डे-फुंसी, भूख, ह्वदय रोग, कोढ़ आदि बीमारियों का कारक कहा गया है। हम जानते हैं कि राहु और केतु असुर संस्कृति के ग्रह हैं। जन्मपत्रिका में केतु यदि पीç़डत हो जाएं तो ये भूत, प्रेत, पिशाच आदि वायव्य बाधाओं के कारण बनते हैं। केतु के रत्नों में लहसुनिया और नीलमणि प्रमुख हैं। प्रश्A लगA की जाँच करते समय पत्रिका में यदि केतु संबंधी विषय, भाव इत्यादि हो या केतु का संबंध किसी भी प्रकार से पृच्छक के प्रश्A से हो रहा हो तो यहाँ फल प्राप्त होने की अवधि तीन माह के अंतर्गत बतानी चाहिए।
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