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राहु का स्वरूप तथा ग्रहों के साथ युति के फल - श्रीराम शर्मा
हजारों वर्ष पूर्व जब राक्षस संस्कृति पृथ्वी पर विद्यमान थी उस समय हिरण्यकश्यप नाम का राक्षस था। हिरण्यकश्यप का एक पुत्र प्रहलाद तथा पुत्री सिहिंका थी, सिहिंका के पति विप्रचिति थे, विप्रचित के घर एक पुत्रका जन्म हुआ जिसका नाम स्वर्भानु था, स्वरभानु जब ब़डा हुआ तो एक दिन अपनी माता से कहने लगा कि माता जिस प्रकार देवता पूजे जाते हैं वैसे ही हम राक्षस भी क्यों नहीं पूजे जाते तब सिहिंका ने कहा पुत्र हम राक्षस हैं हमारे कर्म अलग हैे इसलिए हम पूजे नहीं जाते, इस पर स्वर्भानू ने माता से कहा कि माता एक दिन मैं भी इन देवताओं की तरह पूजा जाऊंगा और जगंल में आकर भगवान ब्रrाा की पूजा तपस्या करने लगा, जब स्वर्भानु को तपस्या करते हुये काफी वर्ष बीत गए थे, तभी देवताओं और राक्षसों ने समुद्र मंथन करने की योजना बनाई।
समुद्र मंथन में सभी रत्नों के निकल जाने के बाद जब अमृत प्राप्त हुआ और भगवान विष्णु मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत तथा राक्षसों को शराब (मदिरा) पिला रहे थे तो उधर भगवान ब्रrाा ने स्वर्भानु को दर्शन दिया और अमृत प्राçप्त की बात कही और कहा कि यदि तुम अमृत पी सकोगे तो तुम अवश्य ही पूजे जाओगे स्वर्भानु तुरन्त उस स्थान पर पहुंचा जहां अमृत का वितरण हो रहा था, स्वर्भानु ने देखा कि मोहिनी रूप धारण किये हुये विष्णु जी राक्षसों को मदिरा और देवताओं को अमृत पिला रहे हैं तो स्वर्भानु देवताओं का रूप धारण कर सूर्य व चन्द्र देव के बीच में पहुंच गए, विष्णु भगवान ने जब अमृत स्वर्भानु को दिया तो चंद्र व सूर्य देव ने पहचान कर कहा कि ये तो राक्षस है तब तक स्वरभानु अमृत पी चुका था, विष्णु भगवान ने अपने सुदर्शनचक्र से स्वर्भानु का मस्तक ध़ड से अलग कर दिया, अमृत पान के कारण स्वर्भानु मरा नहीं,कालान्तर में सिर का राहु व ध़ड का केतु नाम प़डा, ब्रrााजी ने ग्रहों में इन्हें स्थान दिया।
इन्हीं राहु-केतु का अलग-2 ग्रहों के साथ युति के अलग-अलग फल होते हैं। राहु व सूर्य यदि शुभ राशियों में मित्र राशियों में शुभ ग्रहों से दृष्ट तथा जन्म पत्रिका के लगA, तृतीय, पंचम, दशम तथा द्वादश भाव में स्थित हों तो मान सम्मान की प्राçप्त होती है। जीवन में भ्रमण का कार्यक्रम अचानक बनता है और जिस उद्देश्य के लिए भ्रमण होता है लगभग पूर्ण होता है, व्यक्ति किसी भी कार्य को अपने हाथ में ले लें तो पूर्ण अवश्य करता है, न्याय व अन्याय में अन्तर समझता है तथा सदैव सत्य का साथ देता है, यदि यह युति द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम में हो तो झगडे़ करने वाला, तामसी प्रवृत्ति वाला, पूवार्जित धन नष्ट करने वाला, परस्त्री मेें आसक्त रहने वाला तथा शेष षष्ठम अष्ठम, नवम व एकादश भाव में स्थित युति से जातक अकारण शत्रुता करने वाला, रिसर्च में व्यस्त रहने वाला, धार्मिक कार्य में रूचि न लेने वाला, कुमार्गो से धन कमाने वाला होता है।
राहु की चन्द्रमा से युति यदि मित्र या स्व राशि में हो तथा अन्य शुभ ग्रहों से दृ्रष्ट हो तो व्यक्ति निज स्वार्थ को छो़ड सामाजिक कार्य करता है, जिसके फलस्वरूप लोकप्रिय होता है, स्वतंत्र व्यापार करने में असमर्थ होते हैं यदि व्यापार करे तो भी सफलता प्राप्त नहीं करते हैं, व्यापार में संकटों का उपाय नहीं कर पाते हैं, यदि कोई इन्हें नौकरी करने की सलाह दे तो इन्हें पसंद नहीं होती है, एकान्त पूर्ण वातावरण में रहना पसन्द करते हैं
 यदि यह युति जन्म पत्रिका में लगA, तृतीय तथा नवम् में हो तो अशुभ होती है, मृत्यु भी अचानक आती है।
 राहु व मंगल युति यदि शुभ राशियों में शुभ ग्रहों से दृष्ट हों तथा जन्म पत्रिका में लगA तृतीय षष्ठम तथा दशम भाव में हो तो व्यक्ति पराक्रमी, समाज सुधार का कार्य करने वाला बुराई प्राçप्त की परवाह न करने वाला। यदि यह युति अशुभ राशि में या अशुभ ग्रहों से दृष्ट हों तो स्त्री से असंतुष्ट, अदालती कार्यो में असफल होता है। धन स्थान में यह युति शुभ राशि में हो तो ब्याज के रूप में धन लाभ होता है। जातक के धन से दूसरों को कल्याण नहीं होता है। चतुर्थ में यह युति हो तो पूर्वार्जित पैतृक सम्पति नष्ट हो जाती है। चतुर्थ भाव में राहु तथा दशम भाव मंगल हो तो जातक जिस भवन में निवास करता है उसमें वास्तु दोष होता है जिसके कारण संतान तथा स्त्रीघात आदि से कष्ट होता है। पंचम स्थान में यह युति संतान सम्बन्धि दोष उत्पन्न करती है। सप्तम में यह युति संतान सम्बन्धी दोष उत्पन्न करती है। सप्तम में यह युति हो तो विवाह देर से होता है तथा पहली स्त्री से सम्बन्ध ठीक न रहने से दूसरा विवाह होने की संभावना होती है। राहु सर्प के समान है तथा मंगल नेवले के समान है। अत: जातक को मंगल के प्रभाव से विषघात नहीं हो पाता।
राहु-बुध यदि युति मित्र राशि में शुभ ग्रह से दृष्ट दशम व एकादश भावों मेे हो तो जातक बुद्घिमान कार्य सम्बन्धि विषय को समझने वाला, शिक्षा पूर्ण होती है।
यदि युति शत्रु राशि में हो या अशुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक की शिक्षा, अधूरी रहती है, अस्थिर स्वभाव, घमं़डी भी हो सकते हैं, खुद को दूसरों की अपेक्षा ज्यादा होशियार समझते हैं।
अन्य स्थानों भावों में अशुभ सम्बन्ध हो तो शान्त बुद्घि वाला, एक से ज्यादा विवाह,पागलपन, स्मरण शक्ति नष्ट होने की संभावना रहती है।
राहु-गुरू- युति शुभ हो तो सम्मान की प्राçप्त होती है, अधिकार की भी प्रçाप्त होती है, यदि जातक राजनीति में हो तो सफलता प्राप्त होती है,
यदि यह युति जन्म पत्रिका के 1,2,4,5,7,9,10,11 भाव में हो तो अच्छी सफलता प्राप्त होती है,
पैतृक सम्पति प्राप्त होती है, द्
वय राहुयुक्तगुरूरिति यस्य जन्मलग्न धनु
मीनराहुस्ति तत्र राशिगते गुरौ रिष्टसम्भवौ वाच्य
 तत् त्रिकोणे वा अथवा यत्रकुत्र राशौ राहुयुक्तौ गुरूरस्ति
तत्र राशिगते शनौ अरिष्ट सम्भवो वाच्य:।।

अर्थात राहु व गुरू लग्न में धनु या मीन में हो तो अरिष्ट योग, त्रिकोण में अथवा किसी भी भाव में राहु, गुरू व शनि की एक साथ युति हो तो भी अरिष्ट योग होता है।
पाराशर के मतानुसार राहु व गुरू धनु या मीन में हो और गुरू षष्ठम या अष्टम का सवामी हों तो जातक अल्पायु होता है। यह युति गुरू चाण्डाल योग भी बनाती है क्योंकि गुरू ब्राrाण तथा राहु चाण्डाल जाति का माने जाते हैं।
 राहु-शुक्र युति यदि शुभ हो अर्थात मित्र राशि में शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो विवाह आकस्मिक होता है, स्त्री निर्धन परिवार की होती है। स्त्री सुख अच्छा प्राप्त होता है, जातक से पहले पत्नी की मृत्यु होती है।
यदि युति अशुभ होकर 3,6,7,8,12 भाव में हो तो पत्नि से लम्बे समय तक सुख की प्राçप्त नहीं होती है, विवाह के बाद आर्थिक कष्ट होता है।
राहु-शनि युति लग्न में हो शुभ ग्रहों से दृष्ट तो बचपन में कष्ट होता है, द्वितीय, तृतीय, में हो तो पैतृक सम्पत्ति को बढ़ाने वाला जीवन के मध्य से भाग्योदय होता है। स्वभाव शान्त रहता है, नौकरी या व्यवसाय करने पर उच्चााटन की प्रवृत्ति नहीं होती है, यदि युति अशुभ हो तो बचपन ननिहाल में व्यतीत होता है, चतुर्थ, पंचम षष्टम में युति हो तो उचे स्तर का व्यवसाय करने वाला उदार प्रकति का होता है, विवाह में बिलम्व, अपने ही बारे में सोचने वाला इनके विरोधी अधिक होते अनुवांशिक रोग की संभावना होती है, सप्तम, अष्टम व नवम स्थान में युति हो तो एक से अधिक विवाह की संभावना, जीवन का प्रथमार्थ सुख में तथा उत्तरार्द्घ कठिन व्यतीत होता है, स्त्री मध्यमस्तरीय परिवार की होती है, रहस्यमयी विद्या को जानने वाले होते है, जीवन के 32 वे वर्ष से भाग्योदय होता है, दशम, एकादश व द्वादश भाव में युति हो तो कार्य क्षेत्र में उलझे रहते है, संतान प्राçप्त में बाधा लालची तथा लोगों द्वारा निदीप्त होते हे, अधिकार व सम्पत्ति के लिए गलत मार्ग को अपनाने वाले किन्तु ब़डे व्यवसाय में सफलता मिलती है, विदेश गमन होता है।
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