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वराहमिहिर का परिचय - संपादक मण्डल
वराहमिहिर परिचय:  वराहमिहिर राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में से एक थे। वे एक गणितज्ञ, खगोलज्ञ और ज्योतिषी थे। उन्होंने पंच सिद्धांतिका, बृहत्संहिता, बृहत् जातक, लघु जातक, योग यात्रा और विवाह पटल आदि ग्रंथ लिखे। वे एक अद्भुत विश्लेषक थे। उन्होंने अपनी पुस्तक बृहत्संहिता में यूनानियों और उनके गूढ़ वैज्ञानिक ज्ञान की प्रशंसा की।
मिहिर का जन्म: मिहिर के पिता आदित्यदास और माता इंदुमती थीं। उनके पिता आदित्यदास सूर्यदेव के प्रबल उपासक थे। उनको सभी प्रकार की सुख-सुविधाएं उपलब्ध थीं परन्तु उनकी कोई संतान नहीं थी। वे निरन्तर सूर्यदेव से संतान पाने की प्रार्थना करते कि उन्हें पुत्र संतान की प्राप्ति हो। पच्चाीस वर्ष की लंबी तपस्या के बाद भी जब उन्हे संतान प्राप्ति नहीं हुई तो उन दोनों ने अपना जीवन समाप्त करने का सोचा। वे दोनों एक नदी के किनारे सूर्यदेव से अंतिम बार प्रार्थना करने गए। अचानक एक बूढ़ा वहां आया, वह स्वयं सूर्यदेव थे। सूर्यदेव ने उन दोनों को आशीर्वाद दिया और बताया कि उन्होंने अपने पिछले जन्म में कुछ पाप कर्म किए थे जिसकी वजह से उन्हें इस जन्म मे नि:संतान रहना प़डा। उन दोनों की लंबी अवधि तक की जाने वाली उपासना के फलस्वरूप उनके जन्म का अपुत्र दोष समाप्त हो गया है। सूर्य देव ने उन्हें यह भी बताया कि आदित्यदास और इंदुमती का पुत्र सूर्य के समान प्रकाश फैलाने वाला होगा और वह राजा विक्रमादित्य के दरबार से जु़डेगा।
 विक्रमादित्य से परिचय: जब मिहिर 21 वर्ष के हुए तब उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। वे एक ब़डे ज्योतिष के रूप में उभरे और उन्हें वाक्सिद्धि (वाक्सिद्धि का अर्थ है बोले गए शब्दों की सत्यता) प्राप्त थी। एक दिन सायंकाल जब मिहिर अपनी संध्या पूजा कर रहे थे तभी राजा विक्रमादित्य अपने सौतेले भाई भाटी के साथ एक व्यापारी के वेश में वहां आए। विक्रमादित्य ने मिहिर से कहा कि हम लोग व्यापारी हैं और किन्हीं विशेष व्यापारिक कारणों से यहां आए हैं। राजा ने मिहिर से पूछा कि उन्हें व्यापारिक सफलता मिलेगी अथवा नहींक् विक्रमादित्य ने मिहिर को 100 स्वर्ण मुद्राएं दीं। मिहिर ने ध्यानपूर्वक देखा और कहा कि वे दोनों व्यापारी नहीं हैं। मिहिर पूर्ण आत्मविश्वास से विक्रमादित्य की ओर संकेत किया और कहा कि आप राजा हैं और भाटी की ओर संकेत किया कि वे मंत्री हैं। साथ ही मिहिर ने यह भी कहा कि आप दोनों सौतेले भाई हैं तथा परिवार की कुछ अन्य गुप्त बातें भी बताई। विक्रमादित्य आश्चर्यचकित रह गए और मिहिर से अत्यधिक प्रभावित हुए। विक्रमादित्य मिहिर को अपने साथ अपने दरबार में ले गए और आजीवन मिहिर वहां रहे।
मिहिर-वराहमिहर कैसे बने: वराहमिहिर से संबंधित जानकारी यद्यपि अधिक उपलब्ध नहीं है परन्तु फिर भी इनसे संबंधित एक रोचक प्रसंग का उल्लेख मिलता है। वाराह का अर्थ है- जंगली सूअर। राजा विक्रमादित्य का राजा चिन्ह वाराह था। भगवान विष्णु के तीसरे अवतार भी वाराह थे।
 जब राजा विक्रमादित्य की रानी ने पुत्र संतान को जन्म दिया तब राज्य के प्रमुख ज्योतिषियों को राजकुमार की जन्मपत्रिका बनाने के लिए कहा गया। सभी ज्योतिषियों की गणनाओं के अनुसार राजकुमार के 18वें वर्ष में उनके जीवन को खतरा था परन्तु किस प्रकार का खतरा था इस बात को लेकर सभी के विचार भिन्न थे। मिहिर ने दुस्साहसपूर्ण भविष्यवाणी की तथा कहा कि राजकुमार के 18वें वर्ष के एक निश्चित दिन राजकुमार की मृत्यु वाराह द्वारा होगी और कोई भी उपाय राजकुमार के जीवन की रक्षा नहीं कर पाएगा। विक्रमादित्य और उनके मंत्रियों ने आपस में सलाह मशविरा किया और उस खतरे को कम करने के लिए विशेष प्रबंध किए। एक ब़डे महल का निर्माण कराया जिसकी दीवारें 80 फुट ऊंची थीं। विशेष्ा सैनिक पहरेदार नियुक्त किए गए और राजकुमार का उस महल से बाहर जाना वर्जित कर दिया गया।
इतने प्रबंध के पश्चात् प्रत्येक व्यक्ति इस बात से आश्वस्त हो गया कि राजकुमार अन्य किसी भी प्रकार से जख्मी हो सकते हैं परन्तु वाराह से नहीं क्योंकि उस महल में पंछी भी पर नहीं मार सकता था। इसके विपरीत मिहिर को इस बात का पूर्ण विश्वास था कि कोई भी मनुष्य ग्रहों और देवताओं द्वारा निर्धारित विधान पर विजय नहीं पा सकता। मिहिर की गणना के अनुसार राजकुमार की मृत्यु शाम में लगभग पांच बजे तय थी। सभी कठोर व्यवस्थाओं के पश्चात् विक्रमादित्य ने मिहिर से अपनी भविष्यवाणी पर पुनर्विचार करने के लिए कहा, परन्तु मिहिर तब भी यही बोले कि मैं अपने कथन पर अडिग हूं। सभी मंत्रियों और अन्य महत्वपूर्ण राज दरबारियों के बीच विक्रमादित्य ने यह घोषणा कर दी कि यदि मिहिर की भविष्यवाणी सत्य होती है तो वे अपना राजचिन्ह उनको हस्तांतरित कर देंगे और वे वराह मिहिर आचार्य के नाम से जाने जाएंगे।
निश्चित समय पर राजा के पास यह सूचना आई कि राजकुमार महल मे खुश और स्वस्थ हैं। मिहिर तब भी शांतचित्त बैठे रहे और उन्होंने राजा से कहा कि राजकुमार तो पहले ही मृत्यु को प्राप्त कर चुके हैं और इस तथ्य की जांच कर ली जानी चाहिए। महल में सबकुछ शांत था परन्तु मिहिर ने कहा कि राजकुमार रक्त रंजित प़डे हैं और किसी भी चौकीदार (दरबारी) ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। वे सभी महल की छत पर गए और राजा अपने पुत्र के शव को देखकर क्षुब्ध रह गए। उन्होंने देखा कि राजकुमार खून के तालाब में डूबे हुए हैं।
 वह नकली वराह जो राजचिन्ह के रूप में बनाया गया था, वह नीचे गिर गया है और उससे राजकुमार को चोट लगी और उनकी मृत्यु हो गई। मिहिर की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई। यद्यपि विक्रमादित्य बहुत दु:खी थे परन्तु फिर भी उन्होंने मिहिर को अपना राजचिन्ह वराह दे दिया और तब से वे वराह मिहिर आचार्य कहलाए।
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