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शनि के अधिकार क्षेत्र

ú शं शनैश्चराय नम:

ú नमस्ते कोणसंस्थाय पिङग्लाय नमोùस्तुते।

नमस्ते बभ्रुरूपाय कृष्णाय च नमोùस्तुते।।

नमस्ते रौद्र देहाय नमस्ते चांतकाय च।

नमस्ते यमसंज्ञाय नमस्ते सौरये विभोH

नमस्ते मंदसंज्ञाय शनैश्चर नमोùस्तुते।

प्रसादं कुरूमे देवेष दीनस्य प्रणतस्य चH

"शनि का इन विषयों पर अधिकार"

पहले आओ  - पहले पाओ" जैसी स्थिति ग्रहों में भी देखने को मिलती है। वर्तमान में व्यक्ति मौकापरस्त और अवसर ग्राही बन गया है। ग्रह भी इस कार्य में पीछे नहीं रहे हैं। जिसको जैसे ही मौका मिला, उसने अपनी प्रिय वस्तुओं को अधिकार में ले लिया। शनि चूंकि सर्वाधिक दूरी पर अवस्थित हैं, सूर्य से भी और पृथ्वी से भी इसलिए जो वस्तुएँ या विषय शेष रह गये थे, जिन्हें अन्य ग्रहों द्वारा निम्नस्तरीय या निंद्य समझकर छो़ड दिया गया, उन सभी विषयों को शनिदेव ने अपने अधिकार में ले लिया। संभवत: कुछ विषय इन्हें भी अरूचिकर लगे, जिन्हें इन्होंने राहु व केतु को दे दिया।

ब्रrााजी ने जब विषयों का अòलाटमेन्ट किया तो शनिदेव के हिस्से में निम्न विषय आये। जिनसे जातक प्रभावित होता है। इन लक्षणों में कुछ जन्मजात या कुछ शनि दशा या गोचरवश प्रकट होते हैं।

शनि देव की मुख्य पहचान है - मंदता अर्थात् दीर्घ सूत्रता। शनि के प्रभाव से जातक में आलस्य और दीर्घ सूत्रता (कार्य में आवश्यकता से अधिक समय लगाना) देखने को मिलती है तथापि ऎसे जातक को इसलिए स्वीकार कर लिया जाता है क्योंकि वे अत्यंत कार्य-कुशल होते हैं। कार्यो की निरंतरता भंग होने में शनि की मुख्य भूमिका होती है क्योंकि जातक अन्यान्य विषयों की ओर कुछ मोह या लालचवश आकर्षित हो जाता है। शनि प्रधान जातक नियम या सिद्घान्तों को अथवा सामाजिक जटिल बंधनों को इतनी आसानी से नहीं नकार पाते। अंततोगत्वा अधिकांश मामलों में इन्हें समझौते करने होते हैं।

हाथी-घोडे़ से अर्थ वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारी वाहन, मालवाहक और हल्के वाहनों से लिया जाता है। इनकी प्राप्ति के अतिरिक्त, इन वाहनों की देख-रेख या मरम्मत संबंधी विषयों में शनिदेव जातक को ले जाते हैं।

चम़डे पर शनि देव का अधिकार है। चम़डा किसी प्राणी की मृत्यु होने पर ही प्राप्त होता है। इसलिए देश की मृत्यु दर, श्मशान, मरणोत्तर क्रियाएं, मरणोत्तर कर्मकाण्ड और मृत देह के अंगों का दान या उनसे संबंधित संस्थाएं शनि के अधिकार में हैं।

कष्टों की अति हो जाना और पुन: परीक्षा की ƒ़ाडी आते रहना, इसके कारण भी शनि हैं। सुनार सोने को तब तक तपाता है जब तक लाल या तरल अथवा शुद्घ न हो जाये तथा पुन: उसे सुन्दर आकृति देने हेतु सुवर्ण पर चोट मारी जाती है। परिणामस्वरूप यह सुवर्ण सुन्दर आभूषण बन जाता है और वैभवशाली व्यक्तियों का सौन्दर्य बढ़ाता है। ठीक यही स्थिति शनि देव भी पैदा करते हैं। शनि दशाओं में अथवा साढ़ेसाती या ढैया में जातक यदि सुवर्ण के समान धैर्य धारण कर तपता रहा (कष्ट पाता) और चोट खाता रहा, (परीक्षा देता रहा अथवा ठोकर खाता रहा) तो शनि के कालवश प्रभाव समाप्त होते-होते जातक अपनी इच्छाओं से भी कहीं बढ़कर सफलता अर्जित करता है। शनि देव जातक को शुद्घ और सदाचारी बना देते हैं। अन्यान्य असामाजिक गतिविधियों या दुर्गुणों से जातक को एकदम मुक्त करने के प्रयास करते हैं, जो इन दुव्र्यवसनों से दूर हो जाते हैं, वे तपे हुए सोने के समान हो जाते हैं और समाज में प्रतिष्ठा पाते हैं। जो इन अशुभ विषयों में उलझे ही रहते हैं, उनके कष्टों का कोई पारावार नहीं होता है। शनि देव कू्रर हैं, पाप ग्रह हैं किन्तु ये जातक को कष्ट तो अधिक और कमर तो़ड (अधिक थकाने वाले) देते हैं लेकिन अंतिम परिणाम अति सुखद प्राप्त होते हैं।

आय पर शनि का अधिकार है। शनि केवलमात्र सद्मार्गो से प्राप्त हुई आय को ही स्वीकार करते हैं, जातक को सुख पूर्वक भोगने देते हैं, असद् मार्गो से प्राप्त आय, दु:खदायी और मानहानि का कारण भी बनती है। यद्यपि ऎसे समय में अनैतिक मार्गो से आय के अधिक अवसर मिलते हैं, जो केवल मात्र जातक की परीक्षा कारक सिद्घ होते हैं, जो जातक संगति दोष से ग्रस्त होकर इन अवसरों को पा लेते हैं, वे शनि देव की परीक्षा में फेल हो जाते हैं, जबकि जो इन अनुचित मार्गो से दूर रहते हैं, वे परीक्षा में पास हो जाते हैं और प्रसव-पी़डा रूपी कष्टों से मुक्त होकर सुखी जीवन जीते हैं।

एक हल्का सा रोग भी लापरवाहीवश प्राण घातक बन जाता है। शनि चूंकि मंद गति हैं सो रोग का निवारण भी शनै: शनै: होता है। पुराने रोगों का अथवा आनुवांशिक रोगों का प्राकट्य शनि देव के प्रभाव से ही होता है। प्रियजनों का बिछोह या उनसे मन-मुटाव होकर दु:ख मिलना भी शनि का प्रभाव है। शनि का प्रभाव सप्तम, लग्न या पंचम पर होने से जातक को जीवन साथी चुनने में सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि मनोनुकूल जीवनसाथी अति दु:खी या कुंठाग्रस्त अवस्था में मार्ग से विचलित नहीं होने देता। मनोनुकूल पत्नी शनि की कृपा के बिना प्राप्त हो ही नहीं सकती। शनिदेव स्वयं पत्नी से शापित होने पर भी पत्नी के प्रति उदार ह्वदय हैं। पश्चाताप स्वरूप उनकी पत्नी भी पति पथ की अनुगामिनी है।

अच्छी पत्नी इसलिए क्योंकि शनि दासवृत्ति के कारक हैं। दासवृत्ति को वर्तमान में परस्पर सेवा भावना, सामंजस्य, विश्वास और कार्यो में सहयोग की प्रवृत्ति के रूप में समझा जा सकता है। अन्य ग्रह एक तरफा सुख या दु:ख देते हैं किन्तु शनि परस्पर सुख या दु:ख की अनुभूति कराते हैं।

अब बात आती है गरीबों की। सामथ्र्यवान लोग, गरीबों को संतुष्ट करते हैं तो शनिदेव उन पर अति प्रसन्न होते हैं। गरीब को गधा या गधे को गरीब कहा जाता है, वो इसलिए कि ये हर बर्ताव चुपचाप सहन करते हैं। प्रत्युत्तर इनके भाग्य में होता ही नहीं। गधा और घो़डा प्रजाति लगभग एक जैसी है किन्तु घो़डा क्रियाशीलता और सम्पन्नता का और गधा आलस्य और दीनता का प्रतीक है।

सामाजिक दृष्टि से जिन कार्यो को हेय और निंदित माना जाता है। पत्रिका में शनि अशुभ प्रभाव में होने पर जातक को चाण्डाल घोषित होना प़डता है अर्थात् अशुभ कर्मो में या सगत में प़डकर व्यक्ति विपरीत मार्गो में प्रवृत्त होता है। जो दीन-हीन, विपरीत अंग वाले भिखारी हैं, उन पर शनि देव का ही प्रभाव होता है। शनि किसी पर कुपित हो जायें तो स़डक पर ले आते हैं और भिखारी बना देते हैं।

शनि प्रधान व्यक्तियों को दाढ़ी-मंूछ बढ़ाने का शौक होता है या उनकी आदत बन जाती है। सुन्दर होते हुए भी या सम्पन्न होते हुए भी मुख पर दाढ़ी रखते हैं। ललाट का विस्तार कम होता है और ऊपर का जब़डा कुछ अधिक विकसित होता है, ऊपर के सामने वाले दाँत अपेक्षाकृत ब़डे होते हैं, कभी-कभी बाहर दिखने लगते हैं। जो सम्पन्न नहीं हैं, वे अपना रहन-सहन कुछ विचित्र रखते हैं, जिससे सूरत डरावनी लगने लगती है।

मातहत या नौकरी पर रखने में शनि प्रधान व्यक्ति पूर्ण विश्वासपात्र सिद्घ होते हैं, वफादार होते हैं। चूंकि शनि को नपुंसक कहा गया है, सो इनमें स्व प्रतिक्रिया या स्व बुद्घिचालकता कुछ कम होती है। ये आदेश की पूर्ति पूरी ईमानदारी से करते हैं पर प्रारंभिक अवस्था में आदेश देने में कतराते हैं। माहौल को समझने में कुछ ज्यादा ही वक्त लेते हैं किन्तु उच्चातर बनने की चाह सदा रहती है। जिस कार्य-व्यवसाय क्षेत्र में ये शुरू में तो नौकर होते हैं लेकिन कालान्तर में स्व प्रयासों से मालिक बन जाते हैं, ये अत्यंत अनुभवी पात्र कहलाते हैं। जिसका हुकुम बजाते हैं, उससे पूर्ण सहानुभूति रखते हैं, लेकिन अपनी कमी या अशुद्घियों या गलतियों को छिपाने में कभी-कभी झूठ का आश्रय भी लेते हैं।

शरीर का पतला और लम्बा होना, देह की अपेक्षा टाँगों का अधिक लम्बा होना और शरीर पर नसों का चमकना या उभरी होना, शनि देव का ही प्रभाव है किन्तु जब नसें उभरकर हरित रंग की दिखाई दें तो इसमें बुध का प्रभाव भी जातक पर समझना चाहिए। इन लोगों को दिन की अपेक्षा रात्रि में कार्य करना अधिक पसन्द होता है। ये लोग रात्रि की पारी में नौकरी करते हैं या देर रात तक काम करते हैं और प्रात: देर से जागते हैं।

जिन जातकों में वृद्घावस्था के चिन्ह शीघ्र प्रकट होते हैं। अवस्था से अधिक आयु के लगने लगते हैं या अवस्था से अधिक उम्र दराज लोगों में उठते बैठते हैं, ये भी शनिदेव का ही प्रभाव है। क्रोध आन्तरिक होता है, बाहरी साहस कम होता है, मान-हानि को लेकर विशेष चिंतित रहते हैं, हर कार्य में ऊँच-नीच और मान-अपमान का विचार करते हैं, अत्यधिक परिश्रम करना ही इनका महत्वपूर्ण गुण होता है, संचयवृत्ति होती है लेकिन संचित सामग्री या धन का स्वयं के लिए, आपत्तिकाल में ही यथायोग्य अन्यथा अधिक बार अन्य परिजनों के लिए उपयोग, इच्छा और अनिच्छा से करना प़डता है।

शनि के प्रभाव से टाँगे लम्बी होती हैं कारण यह है कि अशुभ प्रभाव में शनि होने के कारण, पैरों में कोई रोग, अक्षमता, एक पैर छोटा होना या वायु संबंधी जो़डों का दर्द या लंगडे़पन प्रदान करने वाले हो जाते हैं। ऎसे जातकों को गहरे रंग के कप़डे पहनने का शौक रहता है। नगर निगम या नगर पालिका के कर्मचारी वर्ग शनि का ही विषय है। लेबोरेटरी, बदबूदार जगह, ये पदार्थ शनि के ही विषय हैं। जातक इन्हीं क्षेत्रों में अपनी आजीविका ढूंढ सकता है। जातक को कार्य क्षेत्र में या जन्म स्थान से दूर, अच्छा संरक्षक, जो पिता के समान संरक्षण कर सके, शनि देव की कृपा से ही मिलता है।

शनि के प्रभाव से अर्थात् दशान्तर्दशा या गोचर प्रभाव से जातक के या तो कार्य क्षेत्रों में परिवर्तन होते हैं या वह किसी नए विषय या विद्या की ओर आकर्षित होता है और सीखता है। शनि शुभ होते हैं तो ऎसा करना आयवर्द्धक होता है

अन्यथा व्यर्थ परिश्रम सिद्घ होता है। शनि देव उच्चा राशि, स्वराशि, मित्र, मूल त्रिकोण राशियों में तो बली होते ही हैं साथ ही वक्री होने पर या चन्द्रमा के साथ होने पर चेष्टा बली भी होते हैं। जीवनवर्धक औषधियों पर, जो तत्काल जीवन देने या साँसें बढ़ाने में समर्थ हों, ऎसी औषधियों पर शनि का अधिकार है। शनि के प्रभाव से जातक को ये दवाएं समय पर उपलब्ध हो जाती हैं अथवा जातक ऎसी दवाओं का व्यापार या निर्माण करता है।

इसके अलावा शस्त्रागार, यंत्रागार, जेल, पश्चिममुखी भवन, अपने से नीची जाति से मेल-जोल, तटीय प्रदेश या पुराना तेल, विष, लम्बा बिछोह, दूत या गुप्तचर, चोरी और मन की कठोरता, पुराना मकान या खण्डहर, श्मशान, कापालिक, अंधियारा स्थान ये विषय शनिदेव के हैं।

 इन विषयों का प्रश्नशास्त्र में अधिक उपयोग होता है। ग़डे हुए धन या गुप्त धन का विचार भी शनि से ही किया जाता है। शनि निम्न वर्ग या भृत्य वर्ग के सूचक माने जाते हैं।

शनि की बलवत्ता होने पर ही जातक रूचि अनुसार तथा अन्य ग्रहों के प्रभावानुसार इन विषयों की ओर आकर्षित होते हैं और वे इन क्षेत्रों में ही आजीविका तलाशने में सफल होते हैं।

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