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कुंभ पर्व और बृहस्पति

भारत में हरिद्वार,प्रयाग, नासिक और उ”ौन में कुंभ पर्व का आयोजन देवगुरू बृहस्पति और सूर्य व चंद्रमा की राशि विशेष में स्थिति के आधार पर होता रहा है। प्रत्येक 12 वर्ष में एक स्थान पर कुंभ का आयोजन होता रहता है। बृहस्पति भी 12 वर्ष में राशि चक्र का भ्रमण पूर्ण कर लेते हैं।

जब बृहस्पति-शनि की मूल त्रिकोण राशि कुंभ में होते हैं और सूर्य तथा चंद्रमा, मंगल की राशि मेष में आ जाते हैं तो ऎसे ग्रह योग में भारत में, हरिद्वार क्षेत्र में अमृतमय वातावरण उत्पन्न हो जाता है अर्थात् कुंभ भरता है। इस समय जो हरिद्वार में वास करता है और पतित पावनी गंगा में स्त्रान करता है वह रोग और व्याधियों से मुक्त होकर स्वास्थ्य और आनंद की प्राçप्त करता है।

जब दैत्य गुरू शुक्र की राशि वृषभ में बृहस्पति होते हैं और शनि की राशि मकर में सूर्य और चंद्रमा होते हैं तो त्रिवेणी संगम अर्थात् तीर्थराज प्रयाग में कुंभ का आयोजन होता है। इस ग्रह योग में इस स्थान पर प्रकृति अमृतमयी हो जाती है।

वृश्चिक राशि में जब बृहस्पति होते हैं और सूर्य एवं चंद्रमा भी कर्क राशि में ही होते हैं तब गोदावरी गंगा के तटीय स्थल नासिक में अमृत कणों की वर्षा होती है। इस ग्रह योग में नासिक में कुंभ का आयोजन होता है।

इसी प्रकार जब सिंह राशि में बृहस्पति हों तथा मंगल की राशि मेष में सूर्य हों तथा शुक्र की राशि तुला में चंद्रमा होते हैं तो महाकाल की पवित्र नगरी उ”ौन में अमृत कणों की वर्षा होती है। क्षिप्रा नदी अमृतमयी हो जाती है।

चारों स्थानों पर कुंभ का निर्णय बृहस्पति के आधार पर ही होता है। मुख्य शाही स्नान तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि मेे होेते हैं अर्थात उस मास की अमावस्या में। शाही स्नान सम्पूर्ण कुंभ पर्व में तीन या चार हो सकते हैं। शाही स्नान से तात्पर्य यह है कि इस दिन जीवनदायिनी शक्तियाें, रश्मियों व तत्वों का प्रसरण आकाश मार्ग से वहां की भूमि पर अत्यधिक होता है।

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