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आकर्षक व्यक्त्व का दर्पण - गुरू पर्वत - मुकेश शर्मा

गुरू पर्वत : पहली अंगुली जिसे तर्जनी अंगुली भी कहा जाता है के मूल में मस्तिष्क रेखा, हाथ के पाश्र्व से पहली और दूसरी अंगुली के बीच सीधे ऊपर-नीचे मस्तिष्क रेखा तक जाने वाली काल्पनिक रेखा से सीमाबद्ध गुरू स्थान कहलाता है।

जब हम हथेली पर दृष्टि डालते हैं तो कहीं-कहीं गड्ढेनुमा या उभरे हुये स्थान दिखाई देते हैं। ये उभरे हुये स्थान ग्रह विशेष को प्रदर्शित करते हैं। इनको पर्वत के नाम से जाना जाता है। अनेक बार हथेली में ग्रह क्षेत्र पर अच्छा उभार दिखाई देता है और ऎसा लगता है कि अमुक पर्वत अच्छा विकसित है, परन्तु व्यवहार में देखने पर उस पर्वत के मौलिक गुणों का दर्शन (समावेश) व्यक्ति में नहीं है। इसका कारण है कि उस पर्वत का केन्द्र बिन्दु अपने स्थान से खिसक गया है। पर्वत का केन्द्र बिन्दु आवर्धित लैंस से देखने पर इस प्रकार दिखाई देता है जैसे कि तीन तरफ से आकर मिलने वाली नदियों ने डेल्टा का निर्माण किया है। इस डेल्टा के मध्य बिन्दु को पर्वत का आधार माना जाये तो इसका निर्धारण हो जाता है कि बिन्दु अपने स्थान पर है या इधर-उधर खिसका हुआ है। यदि बिन्दु अपने स्थान पर है तो व्यक्ति में उस पर्वत के गुण विद्यमान होंगे। यदि पर्वत का बिन्दु खिसक गया हो तो मिश्रित गुण या उस पर्वत विशेष के गुणों में कमी आयेगी।

गुरू पर्वत का विस्तृत परिचय

गुरू पर्वत को बृहस्पति पर्वत भी कहा जाता है। गुरू पर्वत मान, प्रतिष्ठा, इच्छाशक्ति, प्रभुत्व की भावना, प्रशासनिक क्षमता, धार्मिकता, आत्मसम्मान, उच्चा पद पाने की अभिलाषा, नेतृत्व, पराविज्ञान नीति, कानून, महत्वाकांक्षा, कुटुम्ब में प्रीति, स्त्री पुत्र-पौत्र का सुख, अनुशासन इत्यादि गुणों को दर्शाता है।

गुरू पर्वत के गुण व दोष

1. यदि गुरू पर्वत उन्नत विकसित हो, देखने में सुन्दर हो तो व्यक्ति स्वाभिमानी प्रवृत्ति का होने के साथ महत्वाकांक्षी होता है। उसे वही कार्य पसन्द होता है जिस पर उसका एकाधिकार हो, वह राजनीति एवं साहित्य के क्षेत्र में रूचि रखता है तथा खेल, व्यवसाय या नौकरी के क्षेत्र में जो उसे मिला हुआ हो, उसमें अपना प्रभुत्व रखता है। अति विकसित होने पर व्यक्ति अहंकारी, आडम्बर प्रिय तथा झूठी शान-औ-शौकत पर बहुत खर्चा करने वाला होता है। उसमे ईष्र्या की भावना जन्म लेती है तथा दूसरों को नीचा दिखाने से भी नहीं चूकता।

2. यदि गुरू क्षेत्र के साथ-साथ शुक्र क्षेत्र भी विकसित हो तो व्यक्ति प्रेम एवं वैवाहिक सम्बन्धों में मन के मुताबिक सफलता प्राप्त करता है।

3. यदि गुरू पर्वत विकसित हो तो प्रवचन, भाषण देने की क्षमता अच्छी होती है। वह समाजसेवी, परोपकारी अथवा राजनेता बनता है। वह अच्छी सलाह देना अपना धर्म समझता है तथा उसके इस कार्य की प्रशंसा होती है। वह बात का पक्का धनी होता है तथा महिला वर्ग से भी उसे सहयोग प्राप्त होता है।

4. यदि गुरू पर्वत दबा हुआ हो तो गुरू पर्वत से सम्बन्धित मौलिक गुणों का विकास नहीं हो पाता। व्यक्ति धर्म के प्रति रूचि न रखकर अविश्वास रखता है तथा महत्वाकांक्षाएं एवं नेतृत्व के गुणों का विकास नहीं हो पाता एवं अपने से ब़डों के प्रति सम्मान व आदर भाव में कमी लाता है।

5. गुरू पर्वत विकसित होने के साथ-साथ अंगुलियां भी नुकीली हों तो व्यक्ति में तांत्रिक तथा भाग्य परीक्षाओं के प्रति विशेष रूचि जागृत होती है।

6. यदि गुरू पर्वत विकसित न होकर चपटा हो तो व्यक्ति शक्की मिजा$ज का होता है। केवल स्वयं का स्वार्थ सिद्ध करने की भावना होती है तथा कामवासना अत्यधिक होती है।

7. यदि गुरू पर्वत नीचे की ओर खिसक जाए तो व्यक्ति अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता है तथा जल्दबाजी में निर्णय लेने की उसकी आदत बन जाती है तथा रिश्वत लालच देकर ऎसे व्यक्ति से गलत कार्य भी करवाया जा सकता है।

8. यदि गुरू पर्वत अल्प विकसित हो तो व्यक्ति अपने कार्य में किसी और का हस्तक्षेप पसन्द नहीं करता तथा वह भावुक होता है परन्तु उसमें परिस्थिति के अनुसार ढलने की क्षमता होती है।

गुरू पर्वत पर पाये जाने वाले चिन्ह व उनका फल

त्रिभुज : यदि गुरू पर्वत पर त्रिभुज हो तथा वह निर्दोष हो तो वह व्यक्ति हमेशा कूटनीतिज्ञ होता है तथा अपनी उन्नति की इच्छा रखने वाला होता है। यदि दोष युक्त त्रिभुज हो तो व्यक्ति स्वार्थी तथा घमण्डी होता है।

क्रॉस : यदि गुरू पर्वत क्रॉस का चिन्ह हो तो व्यक्ति सोच समझकर कार्य करने वाला तथा सुखमय जीवन व्यतीत करने वाला होता है। उसे ससुराल से विशेष धन मिलता है, उसकी पत्नी भी शिक्षित होती है। उसका गृहस्थ जीवन भी सुखी होता है।

बिन्दु : बिन्दु चार रंग के होते हैं, सफेद, लाल, पीले, काले। काले रंग के बिन्दुओं को तिल भी कहा जाता है। सफेद बिन्दु हमेशा उन्नतिकारक, लाल रंग के बिन्दु बीमारियों के सूचक तथा पीले रंग के बिन्दु रक्त न्यूनता को बताते हैं। काले रंग के बिन्दु लक्ष्मी कारक माने जाते हैं परन्तु स्थान विशेष के अनुसार इनके फल अलग-अलग कहे गये हैं। ये शुभ भी होते हैं तथा अशुभ भी होते हैं।

यदि काला तिल गुरू पर्वत पर हो तो विवाह में बाधाएं बराबर आती रहती हैं। समाज में प्रेम के क्षेत्र में उस व्यक्ति को बदनामी उठानी प़डती है तथा ऎसे व्यक्ति को जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं होती।

वृत्त : यदि वृत्त गुरू पर्वत पर हो तो व्यक्ति प्रभावशाली होता है तथा अपने प्रयत्नों से उच्चा पद प्राप्त करने में सफल रहता है। ऎसे व्यक्ति को ससुराल से अत्यधिक सहयोग मिलता है।

द्वीप : यदि गुरू पर्वत पर द्वीप का चिन्ह हो तो ऎसे व्यक्ति को अपने आप पर भरोसा नहीं होता तथा उसके आत्मविश्वास में कमी होती है।

वर्ग : गुरू पर्वत पर वर्ग अत्यधिक शुभ होता है ऎसा व्यक्ति साधारण परिवार में जन्म लेने पर भी अत्यधिक उच्चा पद पर पहुंचता है। सफल प्रशासक होता है साथ ही साथ उसकी कीर्ति पूरे संसार में फैलती है तथा उसे बहुत सम्मान मिलता है।

जाल : गुरू पर्वत पर जाल अशुभ माना गया है यदि गुरू पर्वत पर जाल हो तो व्यक्ति कू्रर होता है उसमें दया की भावना नहीं होती। स्वार्थी तथा घमण्डी होता है।

नक्षत्र या तारा : गुरू पर्वत पर किसी व्यक्ति के नक्षत्र का शुभ चिन्ह साफ, स्पष्ट एवं निर्दोष हो तो व्यक्ति उच्चा अभिलाषी होता है तथा उच्चा सफलता प्राप्त करता है। व्यक्ति निश्चित ही उच्चा अधिकारी होता है तथा समाज में मिलनसार होने के साथ-साथ परोपकारी होता है।

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