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गुरू भारतीय संस्कृति में - श्री कलानाथ शास्त्री

देवगुरू बृहस्पति की गरिमा भारतीय संस्कृति, पौराणिक वाङ्मय और सांस्कृतिक मान्यताओं में जितनी रची बसी है, उतनी ही ज्योतिर्विज्ञान और खगोल में भी है। इसमें तो किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अनेक वैज्ञानिक तथ्यों को हमने पौराणिक मान्यताओं और प्रतीकात्मक मिथकों में इस तरह पिरो कर रखा है कि विज्ञान हमारे जीवन में रचा-बसा रहे। यह बात अलग है कि सहस्त्राब्दियों के कालातिपात के कारण मिथक ही मिथक हमारी मान्यताओं में रचे बसे रह गए विज्ञान उनमें से तिरोहित हो गया। स्वयं बृहस्पति के साथ भी यही हुआ। देव शब्द का अर्थ है ज्योतिष्मान, चमकदार क्योंकि दिव धातु चमकने के अर्थ में आता है। दीप्यति अर्थात् चमकता है । इसलिए आकाश के चमकदार पिंडों अर्थात् ग्रहों और ताराओं को देव कहा गया। वेदकाल में यह अर्थ अधिक प्रचलित था। गुरू का अर्थ है भारी, गरिमामय। गुरूत्वाकर्षण जैसे शब्दों के कारण यह अर्थ अब तो छात्र भी समझने लगे हैं।

आकाशीय पिण्डों में सर्वाधिक भारी, विशालतम और गरिमामय होने के कारण बृहस्पति ग्रह को देवगुरू कहा गया क्योंकि हमारी मान्यता के अनुसार उनका गुरूत्वाकर्षण सर्वाधिक होता है। वैज्ञानिक तथ्य भी इसकी पुष्टि करते है। देवगुरू का अर्थ देवों के गुरू भी लगा लिया गया और प्रतीक रूप में शतश: पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हो गई, यह स्वाभाविक ही था। वैसे बृहस्पति, ग्रह के रूप में अत्यन्त महिमामय हैं। वेदकाल से उनकी गति की परख हमने कर ली थी। लगभग एक वर्ष का उनका खगोलीय भ्रमण भी हमें ज्ञात था। बृहस्पति- यह एक प्रसिद्ध यज्ञ था जो वाजपेय यज्ञ के समान माना जाता था। ज्योतिर्विज्ञान के ग्रंथों में बृहस्पति की विशालता का, उनके ग्रहाचार का, उनके उपग्रहों का संकेत तो मिलता है कि बृहस्पति विशालतम ग्रह हैं, उनकी चुम्बकीय आकर्षण शक्ति सर्वाधिक है तथा उनके सोलह उपग्रह या चन्द्र हैं।

इन मान्यताओं का प्रतिबिम्ब पौराणिक कथाओं में रूपात्मक ढंग से पाया जाता है। वायु, मत्स्य, भागवत आदि पुराणों में अनेक ऎसी कथाएं आती हैं जिनसे ज्ञान होता है कि ये प्रजापति थे। अंगिरा इनके पिता, सुनीथा इनकी माता थीं। स्वारोचिष मन्वन्तर के सप्त ऋषियों में भी एक बृहस्पति गिने जाते हैं। चाक्षुष मन्वन्तर में ये मंत्र ब्राrाणकार ऋषि माने जाते थे। जिनकी माता का नाम फाल्गुनी मिलता है। ऋग्वेद में जो इनकी परिकल्पना है वह ब़डी विचित्र है। ये सात मुँह वाले , एक सुन्दर जीभ वाले, पैनें सींगों वाले और सैंक़डो पंखों वाले हैं। इनके हाथ में धनुष बाण भी है और स्वर्णिम परशु भी, इन्हें बुद्धि और वक्तत्व कौशल का देवता माना गया है। स्पष्ट है कि यह प्रतीकात्मक परिकल्पना है। इसी के आधार पर पुराणों की वे कथाएं प्रचलित हुई जिनमें इन्हे देवगुरू होने के कारण चन्द्रमा के भी गुरू बताया गया। इनकी पत्नी तारा बताई गई। चन्द्रमा का गुरू पत्नी से अवैध सम्बन्ध हो जाने के कारण कु्रद्ध गुरू ने उन्हें प्रतिमास क्षय का शाप दे दिया आदि कथाएं प्रसिद्ध हैं। चन्द्र ने गुरू पत्नी तारा का हरण कर लिया था किन्तु देवों ने गुरू-शिष्य में समझौता करा दिया आदि कथाएं खगोलीय घटनाओं की मिथकीय प्रस्तुति है, यह भी विद्व”ान जानते हैं।

मत्स्य पुराण में तो ऎसी भी कथा है कि दैत्यगुरू शुक्र कहलाते हैं और देवगुरू बृहस्पति, किन्तु एक बार शुक्राचार्य ने एक हजार वष्ाü तक तपस्या की, फिर दस वर्ष तक अज्ञात वास किया। इस दौरान बृहस्पति दैत्यगुरू बन गये। वेश बदलने के कारण यह रहस्य किसी को ज्ञात न हो सका किन्तु ज्यों ही शुक्र लौटे और यह पता चला, इन्हें लौटना प़डा आदि। पुराणों में जो प्रतीक कथाएं हैं उनके अनुसार बृहस्पति सोने के रथ पर यात्रा करते हैं, आठ घोडे़ उस रथ को खींचते हैं। हो सकता है आठ उपग्रहों को यह रूपक दिया गया हो क्योंकि प्राचीन पुराणों में आठ घो़डों का वर्णन मिलता है, अन्य कुछ पुराणों में बारह किरणों का आज के विज्ञान ने सोलह उपग्रह तलाश लिए हैं।

वेदकाल में गुरू को सर्वाधिक बडे़ होने के कारण तथा बुद्धि और वाणी के अधिष्ठाता होने के कारण जो गरिमा प्राप्त हुई उसके कारण बृहस्पति नाम लोकप्रिय हो गया। यही कारण है कि अनेक ऋषियों, आचार्यो एवं ज्योतिर्विदों के नाम भी बृहस्पति पाये जाते हैं। एक आचार्य बृहस्पति ज्योतिविज्ञानी के रूप में प्रसिद्ध हैं जो खगोल, कालगणना और संवत्सरों के नामकरण के लिए भी विख्यात हैं। बार्हस्पत्य मान के अनुसार ही हम आज भी संवत्सरों के नाम विलम्बी आदि उद्धृत करते हैं।

बृहस्पति देवगुरू और शुक्राचार्य दैत्यगुरू कहे जाते हैं। दैत्यों और देवों में सदा से तनातनी रही है, विश्वयुद्ध इसी कारण होते थे। देव, दैत्यों का संहार कर देते थे पर वे पुन: फलने-फूलने लगते थे। इसका कारण माना जाता था, मृत संजीवनी विद्या, जो दैत्य गुरू शुक्राचार्य के पास थी। इस विद्या को प्राप्त करने का प्रयत्न देवगण किया करते थे। देवगुरू बृहस्पति भी इसमें मदद देते थे। एक बार देवों ने देवगुरू बृहस्पति के पुत्र कच को किसी न किसी प्रकार से यह विद्या प्राप्त करने के लिए शुक्राचार्य के पास शिष्य बनाकर भेजा। कच मन लगाकर सैक़डों वर्षो तक अनेक विद्याओं का अध्ययन करता रहा। इस दौरान शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी को कच से प्रेम हो गया। फिर क्या हुआ- यह कथा तो महाभारत के कारण जन-जन में परिज्ञात हो ही गई है। इस पर कथाएं, काव्य आदि भी खूब लिखे गये हैं। यह अपने आपमें प्रतीक कथा है, वह बात अलग है।

कथा दिलचस्प होने के कारण सदियों से लोकप्रिय है। दैत्यों को जासूसी के कारण ज्यों ही मालूम हुआ कि कच तो गुप्त रूप से संजीवनी विद्या लेने आया है, उन्होंने उसे मार डाला किंतु शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या से (देवयानी के बार-बार आग्रह करने पर) उसे जीवित कर दिया। दैत्यों ने अब यह रास्ता निकाला कि कच को मारा, जला कर फूंका, उसकी भस्म को मदिरा में मिलाकर स्वयं शुक्राचार्य को पिला दिया कि अब किस प्रकार उसे जीवित करेंगे शुक्राचार्य। इस पर शुक्राचार्य ने भी नहले पर दहला चला मृत संजीवनी विद्या से उसे ज्यों ही जीवित किया, वह पेट में से बोला। अब यदि वह पेट फ़ाडकर बाहर निकलता है तो शुक्राचार्य मारे जाते हैं इस पर उन्होंने यह युक्ति निकाली कि पेट में ही कच को मृत संजीवनी विद्या सिखाई और यह आदेश दिया कि वह पेट फ़ाडकर बाहर निकले। उसके बाद शुक्राचार्य की यदि मृत्यु हो जाए तो वह उन्हें इसी संजीवनी विद्या से जीवित कर दे। यही हुआ, इस प्रकार दोनों बच गये किंतु जब देवयानी ने कच से विवाह का प्रस्ताव किया तो उसने गुरू कन्या होने के कारण उसे नहीं माना। इस पर देवयानी ने यह शाप दिया कि यह संजीवनी विद्या तुम्हें नहीं फलेगी अर्थात् तुम किसी को जीवित नहीं कर सकोगे। कच ने भी देवयानी को शाप दिया कि तुम्हें अपने वर्ण का वर नहीं मिलेगा अर्थात् विजातीय वर ही मिलेगा। तभी देवयानी का विवाह ययाति राजा से हुआ जो कथा प्रसिद्ध है।

कच को यह शाप था कि वह मृत संजीवनी विद्या से किसी को जीवित नहीं कर सकेगा परंतु यह विद्या किसी को नहीं सिखा सकेगा, ऎसा शाप नहीं था इसलिए उसने लौटकर स्वर्ग में जाकर यह विद्या देवताओं को सिखा दी। यह कथा, मत्स्य पुराण, महाभारत, श्रीमद्भागवत आदि पुराणों में सुप्रसिद्ध है। केवल प्रसंगवश बृहस्पति के पुत्र कच के परिचर्यार्थ हमने यहाँ उद्धृत की है।

भारत में गुरू को, शिक्षक को, विद्यादाता को, मंत्रदाता को, मार्गदर्शक को सर्वोच्चा श्रद्धा का अधिकारी माना गया है। जो देश, ज्ञान के पूजक हैं उन सबमें गुरू को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है। कृष्ण जगद्गुरू हैं, वेदव्यास मंत्र गुरू हैं इसलिए हम उन्हें पूजते हैं। गुरू नानक और गोविन्द सिंह तक दस गुरू मार्गदर्शक होने के कारण पूजे जाते हैं। उनके बाद उनकी गुरू परम्परा ग्रंथ साहेब में समाहित हुई इसलिए ग्रंथ की पूजा होती है।

कबीर का यह दोहा प्रसिद्ध है-

गुरू गोविन्द दोऊ ख़डे काके लागूँ पाय।

बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बतायH

इसका तात्पर्य यह नहीं है कि गोविन्द से ब़डा गुरू होता है बल्कि इसका आशय यह है कि ज्ञान का महत्व तभी है जब हम उसे अधिगत कर लें, अत: उस ज्ञान को हम तक पहुंचाने वाला महत्वपूर्ण है- वह चाहे गुरू हो या ग्रंथ।

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