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बृहस्पति के नक्षत्र - श्रीराम शर्मा

बृहस्पति के नक्षत्र

व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र पर संचार कर रहे होते हैं वह उसका जन्म नक्षत्र कहलाता है। जन्म नक्षत्र का प्रभाव व्यक्ति के आचरण एवं व्यवहार पर पूर्ण रूप से प़डता है तथा व्यक्ति के गुण एवं दोष उसके नक्षत्र के अनुरूप ही देखने को मिलते हैं। अब हम बृहस्पति के तीनों नक्षत्र पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद का विस्तृत वर्णन कर रहे हैं।

पुनर्वसु : पुनर्वसु शब्द का अर्थ है पुन: वास। अत: अच्छे के लिए परिवर्तन करने का गुण इस नक्षत्र में हैं। पुनर्वसु नक्षत्र के तीन चरण मिथुन राशि में एवं एक चरण कर्क में आता है। इस नक्षत्र के स्वामी गुरू हैं। इस प्रकार बुध, चंद्रमा एवं गुरू का सम्मिलित प्रभाव पुनर्वसु नक्षत्र में होता है। बुद्धि, कल्पना और आध्यात्म इस नक्षत्र से प्रभावित व्यक्ति के जीवन के महत्वपूर्ण विषय होते हैं। यही प्रभाव इन व्यक्तियों को वाक्पटुता भी देता है तथा लेखन आदि के प्रति झुकाव पैदा करता है। बुध का यथार्थ होने के कारण इस नक्षत्र से प्रभावित व्यक्ति हवाई किले नहीं बनाते अपितु कार्यो के क्रियान्वयन में विश्वास रखने वाले होते हैं।

पुनर्वसु नक्षत्र का चिह्न "धनुष बाण" है। अत: लक्ष्य बनाने एवं साधने की कला यह नक्षत्र देता है इसमें जन्मे व्यक्तियों का दृष्टिकोण सकारात्मक होता है, यथार्थवादी होने के कारण यह नक्षत्र व्यक्तियों को जोखिम लेने के लिए प्रेरित नहीं करता है इसलिए इनकी निर्णय लेने की क्षमता अधिक सुदृढ़ नहीं होती।

पुनर्वसु नक्षत्र की देवी माता अदिति हंै। ये देवताओं की माता है, इसलिए पालन-पोषण, संवेदनशीलता आदि गुण भी पुनर्वसु नक्षत्र में निहित है।

विशाखा : बृहस्पति के नक्षत्रों मेे दूसरा नक्षत्र विशाखा है इस नक्षत्र के प्रथम तीन चरण "तुला राशि" में तथा अंतिम चरण वृश्चिक राशि में प़डता है। इस नक्षत्र के स्वामी ग्रह "देवगुरू बृहस्पति" हैं तथा तुला व वृश्चिक राशि में प़डने के कारण इस नक्षत्र पर शुक्र, बृहस्पति तथा मंगल का सम्मिलित प्रभाव रहता है। स्वामी ग्रह बृहस्पति वाक् कला, मंगल ऊर्जा तथा शुक्र लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए असाधारण प्रयास प्रदान करते हैं, यह सभी समग्र रूप से इस नक्षत्र में जन्मे व्यक्तियों के स्वभाव व व्यक्तित्व में परिलक्षित होता है। योजनाबद्ध ढंग, आशावादी दृष्टिकोण व दृढ़ निश्चय इस नक्षत्र की मुख्य देन है।

"विशाखा" नक्षत्र के प्रतिनिधि देवता इन्द्र एवं अग्नि हैं। "अग्नि व इन्द्र" लक्ष्य के प्रति समर्पण तथा कभी-कभी लक्ष्य साधने की चेष्टा में मार्ग से भटका भी देते हैं। इस नक्षत्र में जन्मे व्यक्तियों के व्यक्तित्व में यह सब बातें देखने को मिलती हैं। इस

नक्षत्र का प्रतीक चिह्न "एक आकर्षक मुख्य द्वार" के समान है, जो आने-जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति से संबंधित होता है। विशाखा नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति अपनी दृष्टि गिद्ध की भांति पैनी रखते हैं तथा अपने बाहरी व भीतरी शत्रुओं को परास्त कर अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं परन्तु इस सब बातों से इस नक्षत्र के जन्मे व्यक्तियों के व्यवहार में क्रोध एवं "झग़डालूपन" भी आ जाता है और नकारात्मक विचार भी इन पर हावी हो जाते हैं।

शास्त्रों के अनुसार यह नक्षत्र "भगवान श्रीकृष्ण" की प्रिया राधा से संबंधित है, जिनके श्रीकृष्ण से निस्वार्थ प्रेम ने उन्हें श्रीकृष्ण की पत्नी से ऊपर स्थापित किया।

पूर्वाभाद्रपद  : बृहस्पति के नक्षत्रों में तीसरा नक्षत्र पूर्वाभाद्रपद है। इस नक्षत्र के तीन चरण कुंभ राशि में तथा अंतिम चरण "मीन" राशि में आता है। अत: इस नक्षत्र पर शनि एवं गुरू का मिश्रित प्रभाव रहता है। पूर्वाभाद्रपद शब्द का अर्थ है- जन्म से ही भाग्यशाली।

इस नक्षत्र के स्वामी देवता "अजैकपाद", अर्थात् "एक पैर वाली बकरी" हैं। इस नक्षत्र में जन्मे व्यक्तियों में गुरू का ज्ञान व शनि की एकाग्रता का प्रभाव रहता है। किसी पर आश्रित रहने से यह व्यक्ति घृणा करते हैं। बृहस्पति का उर्वर मस्तिष्क व ज्ञान एवं शनि की दार्शनिकता इस नक्षत्र में जन्मे व्यक्तियों के विशेष गुण होते हैं। नए मार्गो को खोजना व उन पर चलना, निष्ठा व कठोर परिश्रम से कार्यो को पूरा करना इस नक्षत्र के व्यक्तियों का स्वभाव होता है।

दिन-प्रतिदिन की क्रियाओं का विश्लेषण करना और उनकी निरपेक्ष आलोचना कर अपनी गलतियों पर पश्चात्ताप करना भी इस नक्षत्र में जन्मे व्यक्तियों में देखा जा सकता है।

इनका स्वभाव गुरू के समान हित करने वाला व कला का उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाला होता है।

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