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बृहस्पति की राशियाँँ - सुमन सचदेवा

व्यक्ति के जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि पर होते हैं, वह व्यक्ति की जन्म राशि होती है। संपूर्ण भचक्र को 12 राशियों में विभक्त किया गया है। सूर्य व चंद्रमा को एक-एक राशि का तथा मंगल, बुध, गुरू, शुक्र एवं शनि को दो-दो राशियों का प्रतिनिधित्व मिला है। कालपुरूष की जन्मपत्रिका में देवगुरू बृहस्पति नवीं एवं बारहवीं राशि का प्रतिनिधित्व करते हैं अर्थात् देवगुरू बृहस्पति की प्रथम राशि धनु व द्वितीय राशि मीन है। राशि मनुष्य के स्वभाव को प्रभावित करती है, अत: गुरू के गुण गुरू की इन राशियों में जन्मे व्यक्तियों में देखे जा सकते हैं।

देवगुरू बृहस्पति की पहली राशि धनुराशि अग्नि तत्व राशि है। इस राशि के व्यक्तियों में अग्नि का पोषक रूप दिखाई देता है। यह अग्नि इन को ज्ञान की ओर ले जाती है तथा अत्यधिक जोखिम उठाने के लिए प्रेरित करती है। अत: ये व्यक्ति बहुत ही उद्यमी होते हैं और नित प्रयोगों एवं खोजों में लगे रहते हैं। इन प्रयोगों और खोजों को पूरा करने के लिए अग्नि का ताप इन्हें दूर-दूर तक ले जाता है। मानव शक्ति का भरपूर प्रयोग करना और करवाना इस राशि के व्यक्ति बखूबी जानते हैं तथा सतत क्रियाशील रहते हैं, परन्तु पोषण एवं ताप देने वाली अगिA जब सत्य वचनों के रूप में इनके मुख से बाहर आती है तो ये व्यक्ति अत्यधिक क्रूर हो जाते हैं तथा वस्तु को जलाकर भस्म करने की प्रवृत्ति भी अपना लेते हैं।

यह एक द्विस्वभाव राशि है। इस राशि के व्यक्ति भी दोहरे स्वभाव वाले होते हैं। कभी संवेदनशील व हास्य-व्यंग वाणी प्रयोग करने वाले और कभी सौम्य तो कभी अत्यधिक क्रूर हो जाते हैं।

इस राशि के स्वामी देवगुरू बृहस्पति हैं। इस राशि के व्यक्ति भी न्याय एवं शांतिप्रिय होते हैं, ईमानदारी एवं मानवीय मूल्यों को बहुत महत्व देते हैं। गुरू की भांति अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होते हैं और उन्हें निष्ठा के साथ पूरा करते हैं। जिस प्रकार कोई गुरू अपने शिष्यों के लिए हितैषी और मित्र दोनों ही होते हैं, ठीक इसी प्रकार देवगुरू बृहस्पति की भांति इस राशि के व्यक्ति भी सबके हितैषी होते हैं।

गुरू ज्ञान के कारक हैं। इस राशि के व्यक्ति भी ज्ञान का अतुल भंडार लिए होते हैं। अनेकों भाषाओं, गुप्त विद्याओं और दर्शन का ज्ञान भी इस राशि के व्यक्तियों को होता है। इस राशि के व्यक्तियों को अपनी योग्यताओं पर पूर्ण एवं अटूट विश्वास होता है। ये किसी भी कार्य को असंभव नहीं मानते। मानवीयता एवं मानव हित इनके लिए सर्वोपरि होते हैं। मानव हित के साथ ही यह व्यक्ति सिद्धांतों एवं नीतियों का पालन दृढ़ता से करते हैं। सिद्धांतों के पालन में किसी तरह का समझौता करना इन्हें पसंद नहीं होता, इसलिए इनके स्वभाव में जिद्दीपन आ जाता है तथा ज्ञान के अतुल भंडार का दंभ भी कभी-कभी इनके व्यवहार में देखने को मिलता है।

इस राशि का चिह्न "धनुर्धर" है जो आधा मनुष्य और आधा अश्वाकार हैं। "धनुर्धर" की ही भांति इस राशि के व्यक्ति भी केवल अपने निर्धारित लक्ष्यों पर निगाहें रखते हैं और उन्हें पाने की चेष्टाएं लगातार करते रहते हैं। धनुर्धर का लक्ष्य एवं अश्व की गति दोनों मिलकर इस राशि के व्यक्तियों को इन्द्रधनुषी कामनाओं और आशाओं की ओर ले जाती है, जिन्हें पूर्ण करना उनका उद्देश्य होता है। इन्द्रधनुषी कामनाएं ज्ञान की शाखाओं से जु़डी होती है।

धनु राशि शरीर में जंघा, ऊरू तथा कूल्हों का प्रतिनिधित्व करती है। इस राशि में मूल, पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र आते हैं, अत: इस राशि के व्यक्तियों के जीवन में इन नक्षत्रों के स्वामी देवताओं केतु, शुक्र एवं सूर्य की महादशाएं आ सकती हैं।

धनु राशि के व्यक्तियों को अपने स्वभाव में आए जिद्दीपन को छो़डने का प्रयास करना चाहिए।

बृहस्पति देव की दूसरी राशि मीन जल तत्व राशि है। जिस प्रकार निर्मल व सौम्य जल व्यक्ति की प्यास बुझाकर उसे जीवन देता है ठीक उसी प्रकार मीन राशि के व्यक्ति भी विनम्र एवं सौम्य स्वभाव के होते हैं। मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण होेते हैं, जल की तरह जीवन देने की इनकी परोपकारी एवं सहानुभूतिपूर्ण प्रकृति होती है। यह सबकी मदद भोलेपन से करते हैं व लोक हितैषी होते हैं और अपने भोलेपन से अक्सर लोगों की धोखाध़डी के शिकार हो जाते हैं। जल का कार्य है बहना तथा अपने राह में आने वाली हर वस्तु को धोना। मीन राशि के व्यक्ति भी सह्वदय होते हैं तथा व्यक्ति की जरूरत पता चलते ही उसी क्षण उसकी मदद के लिए चल प़डते हैं, जैसे जल का प्रवाह असीमित एवं निरन्तर होता है, ठीक वैसे ही इस राशि के व्यक्तियों की कल्पनाएं भी असीमित होती हैं। यह द्विस्वभाव राशि है। द्विस्वभाव अर्थात दोहरा स्वभाव। इस राशि के व्यक्ति भी ऎसे ही होते हैं, ये कभी तो अपनी कामनाओं एवं अभिलाषाओं से अनभिज्ञ होते हैं और कभी इनके मन में अलौकिक कामनाएं होती हैं।

इस राशि के स्वामी देवगुरू बृहस्पति हैं। देवगुरू ज्ञान के कारक हैं। इस राशि के व्यक्ति भी ज्ञानी, ईश्वर में विश्वास रखने वाले होते हैं। गुरू परोपकारी हैं, भेदभाव से रहित हैं जिस प्रकार एक गुरू अपने सभी शिष्यों को समान रूप से, बिना किसी भेदभाव के शिक्षा प्रदान करते हैं ठीक ऎसे ही मीन राशि के व्यक्ति भी सभी से समान व्यवहार करने वाले होते हैं। बुराई के प्रत्युत्तर में भी अच्छाई करना इनकी विशेषता होती है। ज्ञानी गुरू व्यवहार कुशल, समस्त शास्त्रों के ज्ञाता, रूढि़यों का पालन करने वाले हैं। इस राशि के व्यक्ति भी बातचीत की कला में निपुण,समझदार व नीति-निपुण होते हैं। अत: यह व्यक्ति अच्छे सलाहकार होते हैं परन्तु अधिक ज्ञानी होने का दंभ भी इस राशि के व्यक्तियों में आ जाता है। ये आत्मश्लाघी व डींगे मारने वाले होते हैं और कभी-कभी आशा से अधिक आत्मविश्वासी दिखने का प्रयास करते हैं।

इस राशि का चिन्ह जल क्री़डा करती दो मछलियाँ हैं। जिस प्रकार मछली अकेली अपनी ही दुनिया में तैरती रहती है, उसी प्रकार इस राशि के व्यक्ति भी अपने कल्पना लोक में अकेले ही रहना चाहते हैं। इनका काल्पनिक लोक परीकथाओं का सा होता है जिसमें डूबकर यह व्यक्ति जीवन की वास्तविकताओं से दूर चले जाते हैं। जिस प्रकार मछली पानी से बाहर निकाली जाने पर त़डप कर मर जाती है ठीक उसी प्रकार मीन राशि के व्यक्ति जिनसे भावनात्मक रूप से जुडे़ होते हैं, उनसे दूर हो जाने पर उसको सहन नहीं कर सकते । यह राशि शरीर में दोनों पैर तलवे तथा पैर की अंगुलियों का प्रतिनिधित्व करती है।

इस राशि में पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्र आते हैं। अत:इस राशि के व्यक्तियों के जीवन में इन नक्षत्रों के स्वामी ग्रहों गुरू, शनि तथा बुध की महादशाएं आ सकती हैं।

मीन राशि के व्यक्तियों को आत्मश्लाघा की प्रवृत्ति को छो़डने का प्रयास करना चाहिए।

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