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गुरू चाण्डाल योग - श्री सतीश शर्मा

बृहस्पति और राहु जब साथ होते हैं तो गुरू चाण्डाल योग बनता है। चाण्डाल का अर्थ निम्नतर जाति है। चाण्डाल का कार्य श्मशान भूमि के आसपास ही सीमित रखा गया था। कहा गया कि चाण्डाल की छाया भी ब्राrाण को या गुरू को अशुद्ध कर देती है। मैंने शनि और राहु की प्रतिनिधि जनता के बारे में जब सर्वेक्षण करना शुरू किया तो निमA जातियों या मजदूर या श्रमिक वर्ग या कई मामलों में कृषक वर्ग से शनि का सम्बन्ध जो़डा जा सकता है परन्तु राहु का सम्बन्ध अन्त्यज जातियों से है। यदि पुराना इतिहास पढे़ं तो यह वे जातियां मिलेंगी जो कि गाँव में प्रवेश से पूर्व ढोल बजाती थीं।

सम्भवत: समाज के पतन की यह पराकाष्ठा थी और इन जातियों के गौरव में भी वृद्धि हुई है और उच्चा जातियों की मानसिकता में भी परिवर्तन आया है। समाज की जटिलता अब थो़डी कम हुई है पर इस बात को ज्योतिष के आईने में दूसरे ढंग से देखा जा सकता है। राहु और बृहस्पति का सम्बन्ध होने से शिष्य का गुरू के प्रति द्रोह देखने में आता है। यदि राहु बलशाली हुए तो शिष्य, गुरू के कार्य को अपना बना कर प्रस्तुत करते हैं या गुरू के ही सिद्धांतों का ही खण्डन करते हैं। बहुत से मामलों में शिष्यों की उपस्थिति में ही गुरू का अपमान होता है और शिष्य चुप रहते हैं।

यहां शिष्य ही सब कुछ हो जाना चाहते हैं और कालान्तर में गुरू का नाम भी नहीं लेना चाहते। यदि राहु बहुत शक्तिशाली नहीं हुए परन्तु गुरू से युति है तो इससे कुछ हीन स्थिति नजर में आती है। इसमें अधीनस्थ अपने अधिकारी का मान नहीं करते। गुरू-शिष्य में विवाद मिलते हैं। शोध सामग्री की चोरी या उसके प्रयोग के उदाहरण मिलते हैं, धोखा-फरेब यहां खूब देखने को मिलेगा परन्तु राहु और गुरू युति में यदि गुरू बलवान हुए तो गुरू अत्यधिक समर्थ सिद्ध होते हैं और शिष्यों को मार्गदर्शन देकर उनसे बहुत बडे़ कार्य या शोध करवाने में समर्थ हो जाते हैं।

शिष्य भी यदि कोई ऎसा अनुसंधान करते हैं जिनके अन्तर्गत गुरू के द्वारा दिये गये सिद्धान्तों में ही शोधन सम्भव हो जाए तो वे गुरू की आज्ञा लेते हैं या गुरू के आशीर्वाद से ऎसा करते हैं। यह सर्वश्रेष्ठ स्थिति है और मेरा मानना है कि ऎसी स्थिति में उसे गुरू चाण्डाल योग नहीं कहा जाना चाहिए बल्कि किसी अन्य योग का नाम दिया जा सकता है परन्तु उस सीमा रेखा को पहचानना बहुत कठिन कार्य है जब गुरू चाण्डाल योग में राहु का प्रभाव कम हो जाता है और गुरू का प्रभाव बढ़ने लगता है। राहु अत्यन्त शक्तिशाली हैं और इनका नैसर्गिक बल सर्वाधिक है तथा बहुत कम प्रतिशत में गुरू का प्रभाव राहु के प्रभाव को कम कर पाता है। इस योग का सर्वाधिक असर उन मामलों मेें देखा जा सकता है जब दो अन्य भावों में बैठे हुए राहु और गुरू एक दूसरे पर प्रभाव डालते हैं।

गुरू चाण्डाल योग का एकदम उल्टा तब देखने को मिलता है जब गुरू और राहु एक दूसरे से सप्तम भाव में हो और गुरू के साथ केतु स्थित हों। बृहस्पति के प्रभावों को पराकाष्ठा तक पहुँचाने में केतु सर्वश्रेष्ठ हैं। केतु त्याग चाहते हैं, कदाचित बाद में वृत्तियों का त्याग भी देखने को मिलता है। केतु भोग-विलासिता से दूर बुद्धि विलास या मानसिक विलासिता के पक्षधर हैं और गुरू को, गुरू से युति के कारण अपने जीवन में श्रेष्ठ गुरू या श्रेष्ठ शिष्य पाने के अधिकार दिलाते हैं। इनको जीवन में श्रेय भी मिलता है और गुरू या शिष्य उनको आगे बढ़ाने के लिए अपना योगदान देते हैं। इस योग का नामकरण कोई बहुत अच्छे ढंग से नहीं हुआ है परन्तु गुरू चाण्डाल योग को ठीक उलट कोई सुन्दर सा नाम अवश्य दिया जाना चाहिये।

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