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मुहूर्त के आधार सूर्यदेव
\"भूतनामन्त कृत्काल: कालोùन्य: कलनात्म्क:। स द्विधा स्थूल सूक्ष्मत्वान्मूर्तश्चामूर्त उच्यते H\" सूर्य सिद्धान्त में कहा गया है कि समय (काल) दो प्रकार का होता है। एक तो वह जो प्रलय कालिक, संसार का अंत करने वाला है और दूसरा काल व्यवहार में गणना के उपभोग में आता है। जो गणनात्मक काल है, वही कलनात्मक है। अर्थात् जहाँ कला मात्र की भी गणना की जाती है। यह कलनात्मक काल भी दो प्रकार का होता है। एक स्थूल (मूर्त) और दूसरा सूक्ष्म (अमूर्त)। स्थूल काल व्यवहार में गिनने के लिए उपयुक्त है और सूक्ष्म काल गणना के लिए अनुपयुक्त है। जैसे प्राण (श्वास) आदि से निश्चित होने वाला मूर्त काल है। अर्थात् एक स्वस्थ पुरूष की एक श्वास-उच्छवास क्रिया में जो समय लगता है उसे प्राण या असु कहते हैं और त्रुट्यादि अमूर्त काल है। एक सुई से कमलपत्र को भेदने में जो समय लगता है, उसे त्रुटि कहते हैं। 60 त्रुटि का एक रेणु, 60 रेणु का एक लव, 60 लव का एक लेशक, 60 लेशक का एक प्राण और 60 प्राण का एक पल, 60 पल का एक घटि तथा 60 घटि का एक नक्षत्र दिन होता है। एक दिन के भी दो भाग होते हैं-एक दिन और एक रात्रि। दिन व रात्रि के मुख्य आधार सूर्यदेव ही हैं। सूर्य की स्थिति भेद से ही दिन व रात्रि का नियमन होता है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन और सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक रात्रि का मान होता है। चूंकि चंद्र कलाएं सूर्य पर ही आधारित होती है। चंद्र कलाओं से ही तिथियां बनती हैं। सूर्य और चंद्र जब एक ही राशि में एक ही अंश पर होते हैं तो अमावस्या होती है तथा जैसे-जैसे सूर्य व चंद्रमा की दूरी बढ़ती है, वैसे ही तिथियां बढ़ती हैं। सूर्य से चंद्र की दूरी जब 120 तक होती है तब एक तिथि पूरी होती है। दोनों के मध्य जब अन्तर 1800 का होता है तो पूर्णिमा होती है। एक मास में एक अमावस्या और एक पूर्णिमा होती है। बारह सौर-चान्द्र-नक्षत्र मासों से एक वर्ष बनता है। जो भारतीय संवत् कहलाता है। किसी भी मुहूर्त को निश्चित करने में पचाङग् शुद्धि आवश्यक होती है। मुहूर्त से तात्पर्य है किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने हेतु निश्चित किया गया समय अथवा कार्य का आरम्भ। व्यवहार में तो आज भी किसी शुभ कार्य का प्रारम्भ, मुहूर्त करना कहा जाता है। जैसे कोई पूछता भी है तो यही कि आप दुकान का मुहूर्त कब कर रहे हैं। अशुभ कार्यो के लिए निश्चित समय को मुहूर्त कहना उचित नहीं। केवल शुभ और मांगलिक, विजय प्रदाता कार्यो का शुभ समय, जो उन कार्यो की वृद्धि करे और सफलता मिलेे के लिए ही निश्चित किया जाता है। मुहूर्त का मूल आधार पंचाङग् होता है। पंचाङग् अर्थात् तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इन पांचों ही अंगों के निर्धारण में सूर्य देव ही सर्व प्रमुख हैं। क्योंकि तिथि, सूर्य से चंद्र की अंशात्मक दूरी से निर्धारित होती है। तिथियां सोलह होती हैं। ये ही चंद्रमा की सोलह कलाएं हैं अर्थात् सोलह स्थितियां हैं जो हमें दृश्य होती हैं। वार के निर्णय में भी सूर्य की ही प्रधानता है क्योंकि भारतीय संस्कृति में वार का प्रारम्भ यानि परिवर्तन सूर्योदय से ही होता है अर्थात् एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक एक ही वार माना जाता है, जिसके दिन में सूर्य अधिष्ठाता होते हैं और रात्रि में चंद्रमा। नक्षत्र: आकाश मण्डल में 27 नक्षत्र हैं। जिस नक्षत्र पर चंद्रमा होते हैं, वर्तमान दिन का भी वही नक्षत्र होता है। सूर्य और चंद्र के भोगाांशों से ही योगों का निर्धारण होता है। इन योगों का यथा नाम तथा गुण होता है। कुछ शुभ हैं तो कुछ अशुभ। इस शुभाशुभ का कारण ही सूर्य ही हैं। जैसा कि हम जानते हैं चंद्रमा, सूर्य प्रदत्त प्रकाश से ही चमकते हैं। चंद्रमा जब सूर्य से किसी स्थिति विशेष पर होते हैं तो विषेली गैसों को अवशोषित करते हैं, जिससे चंद्रमा की शक्तियों में कुछ विकार आ जाते हैं, जो व्यक्ति के मन को प्रभावित करते हैं। इन्हीं कुप्रभावों का नाम दुर्योग हैं जो आठ प्रमुख होते हैं। वे क्रमश: वज्र-व्याघात-शूल-व्यतिपात-अतिगण्ड, विष्कुंभ-गण्ड और परिघ होते हैं। इसी प्रकार करण होते हैं। करण एक तिथि में 2 होतेे हैं। तिथि चूंकि घटती-बढ़ती (मान) रहती है। इसलिए तिथि का जो मान होता है, उसका आधा मान एक करण का होता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि मुहूर्त के नियन्ता सूर्य और चंद्र ही हैं। इनके अतिरिक्त अन्य किसी भी ग्रह से मुहूर्त शुद्ध गणना नहीं की जा सकती। मुहूर्त के विषय में सूर्य जहाँ धुरी बनते हैं, वहीं चंद्रमा उनकी इकाई बनते हैं। मुहूर्त का ऎसा कोई भाग नहीं, जहां सूर्य की उपादेयता में कुछ कमी आई हो। किसी भी कार्य की शुरूआत में दिशाओं का भी अपना वैशिष्टय है। दिशाओं का ज्ञान मूर्त रूप से शुद्ध सूर्य के माध्यम से ही होता है। हमारे शुभ मांगलिक कार्यो के करने या न करने में उत्तरायण व दक्षिणायन का बहुत फर्क प़डता है। दक्षिणायन में शुभ मांगलिक कार्यो को करना या आरम्भ करना ठीक नहीं बतलाया। महाभारत में तो उल्लेख मिलता है कि इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त पितामह भीष्म ने अपने प्राण त्याग करने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी। सूर्य का झुकाव-उत्तर से दक्षिण तथा दक्षिण से उत्तर होता है। यहां पथ से तात्पर्य उनकी राशियों में स्थिति से हैं। पृथ्वी को भूमध्य रेखा दो भागों में बांटती है। एक उत्तरी गोल, दूसरा दक्षिण गोल। उत्तरी गोल के सर्वोच्चा बिन्दु को उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी गोल के अध: बिन्दु को दक्षिण ध्रुव कहते हैं। मुहूर्त भारतीय संस्कृति में ही नहीं अपितु विश्व की सम्पूर्ण संस्कृतियों में किसी न किसी रूप में व्याप्त हैं। पृथक-पृथक स्थानों पर विविध रूप में मुहूर्त की मान्यताएें हैं। जिनका आधार दिन-रात्रि, प्रात:-मध्यान्ह-सायं या मन की प्रसन्नता रही है। जिनमें निहित आधार सूर्य और मन के राजा चंद्रमा ही है। सामान्यतया तो कहा जाता है कि जब मन को अच्छा लगे या मन प्रसन्न होवे वह सर्वश्रेष्ठ समय होता है। व्यक्ति की प्रसन्नता या अप्रसन्नता सूर्य पर और ग्रह नक्षत्रों पर आश्रित होती है। ऎसा कदापि नहीं हो सकता कि ग्रह नक्षत्र प्रतिकूल हों और व्यक्ति प्रसन्न रहे। अन्य ग्रह समयानुसार अपनी स्थिति में परिवर्तन करते हैं और विविध गतियों का अनुसरण करते हैं। परन्तु सूर्य और चंद्र सदा अपने पथ का मार्गी होकर ही अनुसरण करते हैं। इसलिये मुहूर्त के मुख्य आधार सूर्य व चंद्र ही हैं। चंद्र प्रतिदिन अपनी स्थिति में परिवर्तन नक्षत्रों का भोग करते हुये करते हैं। जिससे किसी व्यक्ति को आज प्रतिकूल हैं तो अगले दिन अनुकूल हो जाते हैं। इसी प्रकार सूर्य भी 13 से 17 दिनों में अपनी स्थिति में परिवर्तन कर लेते हैं। सूर्य चूंकि काल के निर्णायक हैं इसलिये इनको आधार मानकर मुहूर्त सम्बन्धि गणनाऎं की जाती हैं। अन्य ग्रहों की स्थिति सूर्य के सापेक्ष देखी जाती है। अधिकांश मुहूर्तो में सूर्य नक्षत्र को आधार मानकर ही वर्तमान नक्षत्र (चंद्र नक्षत्र) व राशि का शोधन किया जाता है। सूर्योदय से चूंकि दिन का प्रारम्भ होता है और सूर्यास्त तक सूर्य प्रत्यक्ष होते हैं इसलिये अधिकांश शुभ कार्यो को दिन में विशेषत: चढते दिन में करने की ही मान्यता है। मान्यता यह भी है कि चढते दिन में कार्य सफल होते हैं क्योंकि सूर्य की प्रात: से मध्यान्ह तक की रश्मियां अति शुभ होती हंै। ये रश्मियां व्यक्ति की उच्चा अभिलाषाओं की पूत्तिü में आवश्यक ऊर्जा व्यक्ति को देती हैं। यही मूहूर्त की उपादेयता है कि जिसे आंकाक्षाओं और अभिलाषाओं के जोश के साथ, योजनाओं के साथ कार्य प्रारम्भ किया जावे, वही आकांक्षायें, अभिलाषाओं व योजनाओं के प्रति एकाग्रता व क्रियाशीलता व्यक्ति की परिणति पर्यन्त बनी रहे। बाधाएं हावी न होने पाये। सूर्य चूंकि आत्मा के व बौद्घिक योग्यता के मुख्य कारक हैं और चंद्रमा मन के हैं। व्यक्ति की कार्य योजनाओं में व क्रियाशीलता में मन व बुद्घि का सामन्जस्य अति आवश्यक है। ये दोनों एक दूसरे के जरा भी प्रतिकूल हुयें तो व्यक्ति अनिर्णय व असमंजस में आ जाता है यही कारण है कि मुहूर्त सम्बन्धि जितने भी चक्र हमारे ऋषियों ने आचायोंü ने प्रतिपादित किये उनमें सूर्य अर्थात् आत्मा-बुद्घि से मन यानि चंद्रमा की स्थिति का आंकलन किया जाता है। वार के स्वामी सूर्य और तिथि-नक्षत्रों के स्वामी चंद्रमा के परस्पर मिलान से सिद्घ,सर्वार्थ सिद्घ, अमृत सिद्घ, त्रिपुष्कर, द्विपुष्कर,काल, तुम्बक उत्पात, मृत्यु आदि योग बनते हैं। इन योगों का फल इनके नाम अनुसार होता है- जैसे:- रवि-मंगल-नंदा, भृगु चंद्र भद्रा। बुध जया रिक्ता गुरू, पूर्णा शनि मृत्युदाH अर्थात रवि मंगलवार को नंदा (1,6,11) तिथि हो तो मृत्यु योग, शुक्रवार और सोमवार को भद्रा (2,7,12) तिथि, बुध को जया (3,8,13), गुरूवार को रिक्ता (4,9,14) तथा शनिवार को पूर्णा (5,10,15) तिथि हो तो मृत्यु योग होता है। इसी प्रकार- जया मंगल, बुध भद्रा, पूर्णा को गुरूवार। शुक्र नंदा शनि रिक्ता, सिद्घि होत विचारH अर्थात मंगलवार को जया तिथि, बुधवार को भद्रा, गुरूवार को पूर्णा, शुक्रवार को नंदा और शनिवार को रिक्ता तिथि हो तो सिद्घि योग होता है इसमें किये गये कार्य सिद्घ अर्थात पूरे होते हैं। तात्पर्य यह है कि तिथि रूप चंद्रमा और वार रूप सूर्य का मिलान कभी शुभ तो कभी अशुभ फलदाता होता है। इसी प्रकार वार विशेष में नक्षत्र विशेष होने पर सर्वार्थ सिद्घ येाग बनते है जिनमें किये गये कार्य निर्बाध पूरे होते हैं। जैसे- द्य रविवार को -अश्विनी, पुष्य तीनों उत्तरा, हस्त अथवा मूल हो। द्य सोमवार को- रोहिणी, मृगशिरा,पुष्य, अनुराधा अथवा श्रवण हो। द्य मंगलवार को- अश्विनी, कृत्तिका, अश्लेषा अथवा उ.भा.हो। द्य बुधवार को- कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, अनुराधा हो। द्य गुरूवार को : अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, अनुराधा या रेवती हो। द्य शुक्रवार को- अश्विनी, पुनर्वसु, अनुराधा, श्रवण या रेवती हो। द्य शनिवार को- रोहिणी, स्वाति या श्रवण हो। उक्त वारों में उक्त नक्षत्र हो तो सर्वार्थ सिद्घ योग होता है यह योग सभी शुभ-मांगलिक कार्यों की वृद्घि करता है तथा शुभ फल प्रदान करता है। इन योगों में शुभ मांगलिक कार्यों का प्रारम्भ इसीलिए किया जाता है, पर आचार्यों को और भी आगे सोचना प़डा। क्योंकि इनमें से कुछ सिद्घ योगों में कुछ कार्य सफल नहीं हो पा रहे थे। गहन शोध का यह परिणाम था कि -\"भूमाश्विनी शवौ ब्राrां गुरो पुष्यं विवर्जयेत्।\" अर्थात मंगलवार को अश्विनी नक्षत्र हो तो गेहारंभ और ग्रह प्रवेश न करें। यद्यपि मंगलवार गेहारंभ व ग्रह प्रवेश हेतु ग्राहय नहीं हैं। तथापि मंगलवार को अश्विनी नक्षत्र होने पर सिद्घ येाग होता है यह जानकर गृह सम्बन्धि कार्यो को प्रारम्भ न करें। तथा शनिवार को जब रोहिणी नक्षत्र हो तो सर्वार्थ सिद्घ योग होता है परन्तु भूलकर भी इस योग में यात्रा नहीं करनी चाहिये। जब गुरूवार को पुष्य नक्षत्र पर चंद्रमा हो तो भी सर्वार्थ सिद्घ योग होता है पर इस योग में विवाह करना अशुभ होता है। फिर बात आती है अभिजित मुहूर्त की। अभिजित मुहूर्त पृथक-पृथक स्थानों पर पृथक-2 समय प्राप्त होता है। जैसा कि मुहूर्त शास्त्र का नियम है कि दिन में 15 मुहूर्त होते है और रात्रि में भी 15 मुहूर्त होते है इस प्रकार एक अहोरात्र में 30 मुहूर्त होते हैं और एक मुहूर्त का मान 2 घटि = 48 मिनिट होता है। किसी स्थान पर जब सूर्य ठीक सिर के ऊपर हों अर्थात् वस्तु की छाया अत्यल्प हो तो मध्यान्ह काल होता है। ठीक मध्यान्ह काल से 24 मिनिट (घटी) पूर्व से 24 मिनिट बाद तक का समय अभिजित् काल होता है। यह सर्वश्रेष्ठ समय होता है किसी भी कार्य के लिये। किन्तु इसमें दक्षिण दिशा की यात्रा आरम्भ नहीं की जाती। अभिजित मुहूर्त की प्रशंशा में कहा है कि- यात्रानुपाभिषेकावुद्वाहोùन्यच्चा माङग्ल्यम। सर्वे शुभदं ज्ञेयं कृतं मुहूर्तेùभिजित्संज्ञेH अर्थात यात्रा, राज्याभिषेक, पदग्रहण, विवाहादि समस्त शुभ मांगलिक कार्योमें अभिजित मुहूर्त जिसकी कुतुप संज्ञा होती है श्रेष्ठ होता है। आचार्य चंडेश्वर ने तो कहा है कि अभिजित मुहूर्त में सूर्य नारायण खमध्य में होते है इस समय चक्रपाणि भगवान् अपने चक्र से समस्त दोषों का नाश कर देते हैं। ऋषि नारद जी ने कहा है कि व्यतिपात, भद्रा, उत्पात और अन्य ग्रह जन्य दोषों को सूर्य मध्यान्ह काल में खमध्य में होने से हर लेते हैं। तो इस तरह हम गर्व से कह सकते हैं कि मुहूर्त के प्रमुख आधार सूर्य देव ही हैं। प्रत्येक मुहूर्त का ये मुख्य विषय होते हैं।चाहे भूशोधन, अगिAवास हो, पंचक हो, वृषभ चक्र- कूर्म चक्र, कुंभ चंक्र आदि कोई भी चक्र हो सब सूर्य देव को मुख्य आधार मानकर ही शुद्घ किये जाते हैं। जैसे उपनयनगोदान परिणयन गृह प्रवेश गमनानि। अस्त मितेषु न कुर्यात्सुरगुरू भृगु पुत्र चन्द्रेषुH यहां सूर्य के साहचर्य में जब गुरू-शुक्र तथा चंद्र अस्त हो तब विवादि शुभ मांगलिक कार्यो को करने की मनाही है- इसीप्रकार अग्न्याधानं प्रतिष्ठां च यज्ञ दान वृतानि च। वेदव्रत वृषोत्सर्ग चूडा करण मेखला। माङग्ल्ययमभिषेकं च मलमासे विवर्जयेत्H अर्थात सूर्य जब धनु या मीन राशि में रहे अर्थात मलमास हो तब भी शुभ मांगलिक कार्य नहीं किये जाते। इसलिये सूर्य देव ही मुहूर्त के महानायक है।
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