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जैमिनि ज्योतिष्ा और राजयोग
जैमिनि मुनि वेदव्यास जी के अत्यंत प्रतिभाशाली शिष्य थे। उन्होंने अपने सभी ग्रंथों में नवीनतम शोधों का समावेश किया। जैमिनि मुनि को मीमांसक के रूप में जाना जाता है। मीमांसा से तात्पर्य विषय का गहनतम अध्ययन करना और उसका सार व्यक्त करना है। जैमिनि ऋषि ने अपने ज्योतिष ग्रंथों में भी अपनी इसी विद्या का परिचय दिया। उन्होंने ज्यादा उलझाने का प्रयास तो नहीं किया किन्तु सीधी-सीधी नई प्रणालियां उन्होंने विकसित की। सभी प्रणालियों का मुख्य आधार उन्होंने लगA, भाव, पद, आत्मकारकादि को माना है। उन्होंने अपनी गणनाएं भाव, लगन, पद, कारकादि को ही आधार बनाकर की तथा फलकथन में प्रथम राशियों की महत्ता उन्होंने बतलाई। ग्रहों को राशियों के चालन अर्थात् माध्यम उन्होंने बतलाये। आपका मत रहा कि ग्रह स्वतंत्र फल देने की अपेक्षा राशियों की स्थिति और दृष्टि के आधार पर परिणाम देते हैं। किसी भाव विशेष में स्थित राशि को यदि कोई अन्य राशि जिसमें कि कोई ग्रह है, देखती है तभी उस दृष्ट भाव (राशि) पर दृष्टा ग्रह के प्रभाव आ सकते हैं। यदि कोई ग्रह किसी राशि विशेष में है तो वह राशि जिन राशियों (भावों) को देखती है, ग्रह का प्रभाव भी उन्हीं राशियों पर आयेगा, अन्य पर नहीं। आप शायद जान गये होंगे। जैमिनि ज्योतिष में ग्रहों की नहीं राशियों की दृष्टि होती है। प्रत्येक चर राशि अपने से दूसरी स्थिर राशि के अतिरिक्त अन्य स्थिर राशियों को देखती है। प्रत्येक स्थित राशि अपने से 12वीं चर राशि के अतिरिक्त अन्य चर राशियों को देखती है। प्रत्येक द्विस्वभाव राशि अपने अतिरिक्त अन्य द्विस्वभाव राशियों को देखती है। ठीक उपरोक्त प्रकार ही इनमें बैठे ग्रहों की दृष्टियां हो जाती है। राजयोगों की चर्चा में जैमिनि मुनि ने कुछ शब्द प्रयुक्त किये हैं, उनकी संक्षेप में चर्चा भी हो जानी चाहिये। पद : किसी राशि से राशि का स्वामी जितनी आगे हो, राशीश से उतनी ही आगे उस (भाव) राशि का पद होता है। उपपद : राशि से 12वीं राशि का उपरोक्त संस्कार करने पर उपपद आता है। आत्मकारकादि : जन्म समय लगA के अलावा जिस ग्रह के अंश सर्वाधिक होवें वही आत्मकारक होता है, उससे कम अंश वाला अमात्यकारक, भातृकारक, मातृकारक, पुत्रकारक, ज्ञातिकारक तथा सबसे अल्प अंश वाला ग्रह दाराकारक होता है। ये चर कारक होते हैं। राजयोगों की चर्चा करते हुए वे कहते हैं कि लगA व आत्मकारक दोनों ही राजयोगों का निर्णय करने में महत्वपूर्ण होते हैं। साथ ही लगAेश व आत्म कारकेश भी महत्वपूर्ण होते हैं। इनके द्वारा राजयोगों पर जो निर्णय दिये गये, वे अद्भुत हैं। अन्य सभी पद्धतियों में किसी ग्रह का अन्य ग्रह से किसी न किसी प्रकार का संबंध हो तो ही योगायोग बनते हैं। पर इन्होंने अकेले ग्रह की स्थिति मात्र से राज वैभव की प्राçप्त अप्राçप्त का सिद्धांत बतलाया है। इनके अनुसार यदि जन्म लगA और चंद्र लगA तथा नवांश लगA को अथवा जन्म लगA, होरा लगA, घटि लगA को केवल मात्र एक ग्रह (राशियों की दृष्टि अनुसार) भी देखता हो तो मनुष्य राजा होता है। राजयोगों का विश्£ेषण जिस प्रकार से इन महर्षि ने किया है, वह आpर्यजनक है, जैसे- 1. लगA पद से द्वितीय स्थान में चंद्र-गुरू व शुक्र हो तो मनुष्य श्रीमन्त या राजा होता है। 2. इसी प्रकार लगA पद से द्वितीय स्थान में कोई ग्रह उच्चा के हों तो भी श्रेष्ठ राजयोग बनता है। इसी तरह अन्य भावों के पद भी निश्चित कर लिये जाते हैं। 3. यदि सप्तम भाव का पद लगA पद से केन्द्र-त्रिकोण या उपचय (3, 6, 9, 11) भावों में हों तो भी शुद्ध राजयोग होता है। यत्र तत्र ऋषि जैमिनि ने अर्गला की ब़डी चर्चा की है। इनके अनुसार जिस ग्रह की दृष्टि यथा युति से राजयोग बन रहा है उस ग्रह पर शुभ ग्रहों की अर्गला हो या अर्गला प्रतिबंधन हो तो सामान्य राजयोग होता है, जिसमें भी बंधन होते हैं। जैमिनि मुनि ने उच्चास्थ और नीचस्थ ग्रहों की ब़डी महत्ता बतलाई है, जैसे- 4. जन्म लगA से द्वितीय में स्थित उच्चास्थ ग्रह को अन्य उच्चस्थ ग्रह देखें (राशिवशात्) तो करो़डों की धन संपदा होती है। 5. जन्मकुण्डली में शुक्र-मंगल-केतु परस्पर एक-दूसरे को देखें तो मनुष्य राजा होता है लेकिन ये तीनों ग्रह परस्पर तृतीय-एकादश हों तो राजा तो नहीं होता पर राजसी ठाट से युक्त राजा से कम भी नहीं होता। आत्मकारक को किसी भी दृष्टि से लगA से कमजोर इन्होंने नहीं बतलाया। ग्रंथों में आये वर्णन से भास होता हे कि सभी कारक जैमिनि मुनि के अंग हैं जिनमें आत्मकारक तो इनकी आत्मा ही है। 6. कारकांश कुण्डली में आत्मकारक के साथ सूर्य हों तो व्यक्ति राजा का कार्य करता है। 7. कारकांश में आत्मकारक से 2, 4, 5वें भावों में शुभग्रह की राशियां हो या शुभ ग्रह हो तो मनुष्य राजा बनता है। 8. आत्मकारक (कारकांश) में से 3 व 6वें भाव में पापग्रहों की राशियां या पापग्रह हों तो यह राजयोग बनता है। 9. आत्मकारक की तरह जन्मकुण्डली में लगAेश व सप्तमेश से 2, 4, 5वें भावों में पापग्रहों की राशियों का पापग्रह हों तो यह राजयोग बनता है। 10. ध्यान रहे लगAेश व सप्तमेश का परस्पर संबंध हो तो जन्म स्थान से दूर और प्रौढ़ावस्था में राजयोग मिलता है। 11. जन्मकुण्डली में लगA या एकादश भाव में गुरू हो और चंद्र द्वारा दृष्ट हो तो ब़डी जागीर या अधिकार प्राप्त राजा होता है। 12. इसी प्रकार जन्म लगA से ग्यारहवें चंद्र, दसवें गुरू और नवम में कोई भी शुभ ग्रह हों तो मनुष्य को राजयोग प्राप्त होता है। 13. कई चर कारकों की युति या परस्पर दृष्टि राजयोगों को जन्म देती है। इनके अतिरिक्त राजयोगों की परिभाषाएं ब़डे विस्तृत रूप में जैमिनि मुनि ने बतलाई है। कुण्डली का विश्£ेषण करने की नई-नई अनेकों पद्धतियां, राजयोगों के रूप में दशांतर्दशा के रूप में जैमिनि मुनि ने हमें बताई। उन्हीं उपलब्ध विधियों को समझते हुए हम उपयोग करते चले आ रहे हैं।
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