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ज्योतिष के प्रसिद्ध चक्र - सतीश शर्मा
किसी व्यक्ति का जन्म समय उस क्षण के लिए खगोल का एक समय बिन्दु होता है और वह समय बिन्दु अपने सारे समीकरणों के साथ पुन:-पुन: आवृत्ति लेता है अर्थात् वह बिन्दु फिर कभी अवश्य प्रकट होगा। उस समय की अंतरिक्ष पिंडों की स्थिति मानव जाति को बल्कि समस्त जीव जाति को प्रभावित करती है। या तो घटनाएं अपने मूल स्वरूप में दुबारा घटेंगी या वह रूप बदलकर और तीव्रता बदलकर किसी न किसी रूप में प्रकट होगी। आइंस्टिन और न्यूटन दोनों ही मानते थे कि घटनाओं की तरंगें अंतरिक्ष मे लगातार विद्यमान रहती हैं और वे विभिन्न तरंगें जब एक-दूसरे से क्रिया-प्रतिक्रिया करती हैं तो घटना जन्म लेती है।
ज्योतिष शास्त्र के अन्तर्गत केवल कुछ ग्रह-नक्षत्रों के आधार पर भी कुछ सीमित चक्रों का आविष्कार किया गया। चक्र से तात्पर्य ग्रहों की गतियों का परस्पर संबंध स्थापित होना है। इस क्रम में ग्रह जब अपने कक्षा पथों पर भ्रमण करते हुए एक-दूसरे से योग करते हैं तो घटनाएं जन्म लेती हैं। मानव जीवन और प्रकृति पर ग्रहों के व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रभाव को जानने के लिए मनुष्य ने बहुत खोजबीन की है। हम ऎसे कुछ तथ्यों की चर्चा इस लेख में करेंगे।
चन्द्रमा का चक्र:
आप अपने जीवन की कोई भी घटना ले लीजिए। चाहे विवाह, चाहे नौकरी या आपकी कमाई का पहला दिन। उस दिन से ठीक सात साल में वह घटना किसी न किसी रूप मे पुन: प्रकट होगी। घटना का स्वरूप अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी। मान लीजिए आपका विवाह अप्रैल 1985 में हुआ तो अप्रैल 1992, अप्रैल 1999, अप्रैल 2006में विवाह से संबंधित अच्छी या बुरी घटनाएं आएंगी। विवाह से तात्पर्य वैवाहिक जीवन से है। आपको देखने को मिलेगा कि अप्रैल के स्थान पर जनवरी, फरवरी भी हो सकता है या मई-जून भी हो सकता है इससे अधिक अंतर देखने को नहीं मिलता।
बृहस्पति का चक्र:
बृहस्पति हर 12 वर्ष के बाद राशि बदलते हैं और वह घटनाक्रम कम या ज्यादा होगा या थो़डे बहुत स्वरूप परिवर्तन के साथ पुन:-पुन: घटता है। मान लीजिए, आपकी नौकरी दिसम्बर 1992 में लगी। इसके ठीक 12 वर्ष बाद आप या तो नई नौकरी मिलेगी या इसी नौकरी मे पदोन्नति होगी या नौकरी जाने का खतरा हो सकता है। अगर मूल घटना शुभ है तो पुनरावृत्ति भी शुभ ही होगी। यदि मूल घटना अशुभ है तो पुनरावृत्ति भी अशुभ ही होगी। कभी-कभी यह क्रम बदल सकता है।
शनि का चक्र:
शनि 30 वर्ष में राशि चक्र की परिक्रमा पूरी करते हैं। जिस राशि में शनि जन्म के समय हों, उसी राशि में वह 27-30 वर्ष की अवधि में प्रवेश करेंगे। जब-जब शनि पुन: उस राशि पर आते हैं तब-तब आजीविका क्षेत्रों में ब़डे परिवर्तन आते हैं। नौकरी या व्यवसाय के बदलने की संभावना रहती है या आदमी नए उपक्रम करता है।
शनि + बृहस्पति चक्र:
जब-जब बृहस्पति जन्मकालीन शनि के ऊपर से भ्रमण करते हैं तो उस वर्ष आजीविका क्षेत्रों में परिवर्तन आते हैं। या तो व्यक्ति नौकरी बदलता है या व्यवसाय के विषयों में परिवर्तन आते हैं। जन्मकालीन बृहस्पति के ऊपर से जब-जब शनि भ्रमण करते हैं तब भी अत्यन्त महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं। प्रथम मामले में हर 12 वर्ष में घटनाओं की पुनरावृत्ति होगी तो दूसरे मामले मे 27-30 वर्ष में घटनाओं की पुनरावृत्ति होगी। इस क्रम में घटनाएं तीव्र हो सकती हैं या रूप बदल सकती हैं। घटनाओं की प्रकृति लगभग एक जैसी होगी।
राहु चक्र:
राहु राशि चक्र में 18वर्ष में अपना एक भ्रमण पूरा करते हैं। वह उसी राशि पर 16से 18वर्ष के बीच मे आते हैं। जब-जब गोचर के राहु जन्मकालीन राहु पर भ्रमण करेंगे तो व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण घटनाएं आएंगी। ऎसा वर्ष आजीविका क्षेत्रों मे व्यापक परिवर्तन ला सकता है।
शनि + बृहस्पति - षष्ठिपूर्ति का नियम:
बृहस्पति व शनि जन्मकालीन राशियों मे जब दुबारा कभी एक साथ आएं जो कि आमतौर से 60 वर्ष में घटित होता है तो व्यक्ति के जीवन में उत्थान या पतन देखने को मिलता है। पुराने समय में षष्ठिपूर्ति का ब़डा सम्मान किया जाता था और व्यक्ति उत्थान की कामना करता था पर कभी-कभी इसका विपरीत भी देखा गया है।
यूरेनस, प्लूटो व नेपच्यून- ऎतिहासिक परिवर्तन:
इन ग्रहों मे कई ऎसी बातें देखने को मिलती हैं जो अन्य ग्रहो के साथ देखने को नहीं मिलतीं। प्लूटो का गतिक्रम अन्य ग्रहों से कुछ विशेष है, बल्कि वृषभ और वृश्चिक राशि में इनका कक्षा भ्रमणकाल अलग-अलग है।
जहां गुरू और शनि की युति 20 से 30 वर्ष के बीच में होती है तथा अगर यह युति अग्नितत्व राशि में होती है तो पुन: अग्नितत्व में ही यह युति 240 वर्ष बाद होती है। पूरी राशियों में इस युति का अगर भ्रमण देखें तो 960 वर्ष लग जाते हैं। ऎतिहासिक घटनाओं का अगर हम अध्ययन करें तो ऎसे युतिकाल विशेष परिणामदायक होते हैं और इतिहास की धाराओं को बदलने में समर्थ हो जाते हैं।
गुरू-शनि की एक ही तत्व में युति का चक्र 240 वर्ष का होता है। युति के चक्र हर ग्रह के लिए अलग-अलग होते हैं। गुरू हर्षल की युति प्रत्येक 14 वर्ष में होती है। इस युति में राजा निरंकुश हो जाते हैं और प्रजा में रोग इत्यादि उत्पन्न होते हैं। शनि और हर्षल की युति का चक्र 45 वर्ष की आवृत्ति में है। प्रत्येक 45 वर्ष में रक्तपात या भूकम्प या युद्ध जैसी स्थितियां आती हैं। नेपच्यून और शनि की युति भी 36वर्ष में एक बार होती है और धरती पर अत्याचार बढ़ते हैं। प्लूटो और नेपच्यून के चक्र 450 वर्षो के आसपास होते हैं और प्रत्येक 450 वर्ष की अवधि पूर्ण होने पर ऎतिहासिक परिवर्तन देखने को मिलते हैं।
इनमें राजशाहियों के पतन अथवा नई राजशाही या सरकारों के उत्थान-पतन देखने को मिलते हैं। लक्ष्मीजी का पूर्व-पश्चिम चक्र: मेरे मित्र जयसिंह कोठारी, जो कि आर्थिक दैनिक नफा-नुकसान के मालिक हैं, ने एक बार बताया कि लक्ष्मीजी 500 वर्ष पूर्व में रहती हैं और 500 वर्ष पश्चिम में। उन्होंने किसी पुस्तक का उदाहरण भी दिया जो मुझे अब याद नहीं है। मैंने इतिहास के पन्ने दोहराए और ज्योतिषीय गणनाएं कीं तो उनके कथन में सत्यता नजर आई। हम जानते हैं कि सम्राट अकबर के समय दिल्ली का दरबार संसार का सबसे धनी दरबार था। उसके बाद लक्ष्मीजी पश्चिमी देशों में पदार्पण कर गई। अब पुन: लक्ष्मीजी पूर्व में आ रही हैं।
भारत, जापान और चीन अब नए आर्थिक साम्राज्यवाद की नींव रख रहे हैं। स्वयं पश्चिमी देश कहते हैं कि अगले बिल गेट्स भारत में ही होंगे। यदि यह सत्य है तो आगामी 500 वर्ष पूर्व के देशों को धनी मिलेंगे और पश्चिमी देश निर्धन हो जाएंगे। इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो यह चक्र भूतकाल की कथा भी कह देता है। एक अन्य चक्र है जो कि उत्तर और दक्षिण में लक्ष्मीजी के वास को लेकर है। हम जानते हैं कि भूमध्य रेखा के दक्षिणी देश गरीब हैं और भूमध्य रेखा के उत्तरी अक्षांशों वाले देश अमीर हैं परन्तु यह क्रम बदलता रहता है। आज की तारीख में हम एक और अक्षांश रेखा से नया पैमाना गढ़ सकते हैं।
कर्क रेखा से उत्तरी अक्षांशों के देश अधिक धनी हैं और कर्क रेखा से दक्षिणी अक्षांशों में जो देश स्थित हैं वे अधिक गरीब हैं। जिन देशों में से कर्क रेखा गुजरती है वे देश धनी और गरीबी के संघर्ष में उलझे हुए हैं और संभवत: अमीर हो जाएंगे। भारत, मध्य एशिया के देश और मुस्लिम देशो में से कुछ को इस श्रेणी में रखा जा सकता है। हर ग्रह के चक्रों को हम समझ सकते हैं। हर निश्चित वर्ष जिसको कि ग्रह पहचानते हैं, परिणामों की पुनरावृत्ति करते हैं।
मान लीजिए हम 100 किलोमीटर जिस जगह लिखा है, उस जगह से बार-बार गुजरते हैं तो 100 किलोमीटर के पत्थर पर आते ही एक विशेष अनुभव होता है। उसी तरह से ग्रह भी अपनी जन्मकालिक परिस्थितियों में आते ही या किसी चक्र विशेष के समय बिन्दु पर आते ही या तो अपना परिणाम दोहराते हैं या उस समय उत्थान-पतन देखने को मिलता है। यह केवल अंधविश्वास नहीं है बल्कि एस्ट्रोनॉमी के प्रकाश बिन्दुओ के स्मृति कोषों को जागृत कर देना है। जब-जब उन स्मृति कोषों को उद्दीप्त ग्रह (रूह्वद्वinड्डrieह्य या ष्टश्ह्यद्वiष् ह्वniह्लह्य) प्रकाशित करते हैं, संसार में नया घटनाक्रम जन्म लेता है। सौभाग्य से हमारे पास ज्योतिष या खगोलशास्त्र या योग जैसी विद्याएं हैं, जो इन समय सोपानों को पहचान सकती हैं।
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