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कृष्ण जन्माष्टमी .............................अनुपम चितकारा
देवक्या पलितो गर्भे ललिता अंके यशोदया।
यशोदयायुतो बालो गोपालो रमतां ह्वदि।।

              श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भगवान विष्णु के 8वें अवतार श्रीकृष्ण के प्राकट्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है। बुरी शक्तियों का अंत करने और भक्तों की मनोकामना पूरी करने के लिए हर युग में ईश्वर का अवतार होता है। द्वापर युग में भी कंस और अन्य असुरों के पाप से जब धरती और मनुष्य त्राहि त्राहि कर उठे तब निराकार ईश्वर ने साकार रूप लेकर धरती को भयमुक्त किया। भाद्रपद मास में रोहिणी नक्षत्र से युत अष्टमी तिथि पर अर्ध रात्रि में श्रीकृष्ण जन्म का वर्णन भागवत महापुराण में किया है।
              रोहिणी नक्षत्र में चन्द्र अपनी पूर्ण उच्च अवस्था को प्राप्त करता है और अपने सभी गुणों का प्रचुर मात्रा में संचार करता है। उसके यही सभी गुण सौम्यता, शीतलता, चंचलता श्रीकृष्ण के चरित्र में भी देखने को मिलते है। श्रीकृष्ण का जन्म उस समय हुआ था जब उनके माता पिता देवकी और वासुदेवजी मथुरा के राजा कंस कि कारागार में कैद थे।
              कंस ने आकाशवाणी से भयग्रस्त होकर अपनी बहिन और बहनोई को कारावास में बंद कर रखा था। आकाशवाणी के अनुसार उसकी बहिन देवकी के आठवां पुत्र को उसका काल होने कि घोषणा कि गयी थी इसलिए श्रीकृष्ण का जन्म भी मथुरा के एक कारागार में ही हुआ था। कारागार में श्रीकृष्ण जन्म से गहरा आध्यात्मिक सन्देश मिलता है। जब तक जीवन में आध्यात्म और ईश्वर की अनुकम्पा का अभाव रहता है तब तक मनुष्य रिश्ते और कत्तüव्य के बन्धनों में उलझा रहता है परंतु जब जीवन में आध्यात्म के प्रकाश का अनुभव होते ही सारे बंधन खुल जाते हंै जैसे देवकी और वासुदेव के खुल गए थे और सभी विकार सुषुप्त हो जाते हंै जैसे कि कारागार के पहरेदार गहरी नींद में चले गए थे। अपने पुत्र की सुरक्षा के लिए वासुदेवजी ने उन्हें जन्म के कुछ क्षणों बाद ही नन्द बाबा के घर गोकुल पहुंचा दिया था। देवकी गर्भसंभूतो यशोदा वत्सलो हरि: गोकुल में ही उन्होंने माता यशोदा, नन्द बाबा और समस्त ब्रजवासियों को आपनी सहज बाल लीलाओं के दर्शन कराके लाभान्वित किया।

                 जिस प्रकार चन्द्र की सुन्दरता अपने सोलह कलाओ के साथ, सौंदर्य कि परिपूरणता सोलह श्रृंगार से, जीवन की सार्थकता सोलह संस्कारों से और इष्ट पूजन की पूर्णता षोडशोपचार से होती है वैसे ही ईश्वरीय अवतार की पूर्णता सोलह कलाओं से होती है। श्रीकृष्ण के रूप में पूर्ण परब्र±म परमेश्वर अपनी सभी सोलह कलाओं के साथ इस धरा पर अवतीर्ण हुए। यह दिन वैष्णव सम्प्रदाय के अनुययियों के लिए अति विशिष्ट है। इस दिन हर घर में बालगोपाल के सेवा, पूजा और उपवास करने कि परंपरा है। भक्त अर्धरात्रि तक नाम संकीर्तन करते हुए अपने इष्ट का आवाहन करते हंै और अपना व्रत सफल बनाते हैं। देश-विदेश के समस्त कृष्ण मंदिरों में यह पर्व धूम धाम से मनाया जाता है लेकिन श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में इसका रंग देखते ही बनता है। श्रीकृष्ण जन्म के समय समस्त ब्रजधाम मनोहारी होकर, नन्द के आनंद भयो के दिव्य रस से भर जाता है। दिन भर की धूमधाम और दर्शन के बाद जन्मभूमि मंदिर में अर्धरात्रि में अभिषेक करा कर मंदिर के पट खोले जाते हैं। वही वृन्दावन का बांकेबिहारी मंदिर जो श्रद्धालुओं श्रीधाम वृन्दावन में आगंतुकों के आकर्षण का केंद्र बिंदु है वहां पर भी यह पर्व अत्यधिक हर्षोल्लास से मनाया जाता है। अर्धरात्रि से कुछ समय पूर्व ही श्रीकृष्ण जन्म कथा का बखान होता है और रात्रि के मध्य में स्त्रान और श्रृंगार करके मंदिर के पट खोले जाते हैं और मंगला आरती कि जाती है। इस मंदिर में साल में सिर्फ जन्माष्टमी कि मध्यरात्रि में एक बार ही मंगला होती है इसलिए भक्त दूर-दूर से इस दिन यहाँ पहुँचते हैं। अगले दिन सुबह नंदोत्सव और दधिकंधो क ीधूम मचती है।
                    श्रीकृष्ण की राजधानी और चार पावन धाम में से एक द्वारका पुरी के द्वारकाधीश मंदिर में भी जन्म महोत्सव की मनोहारी छठा देखने को मिलती है। मायानगरी मुंबई भी इस पर्व के आध्यात्मिक रंग में रंगी नज़र आती है और हर तरफ "गोविंदा आला रे" का स्वर सुनाई देता है। वहां इस दिन दही हां़डी की प्रतियोगिता ऊँचे स्तर पर आयोजित है जिससे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।
दही हां़डी श्रीकृष्ण के बाल्यकाल की उस लीला को दर्शाती है जिसमे वह ब्रज बालाओं की मटकी फो़ड उनका माखन चुरा कर खाते और आनन्दित होते थे।

             जन्माष्टमी पूजन की विधि : पंचामृत या गंगा जल से बालगोपाल को स्त्रान करा कर वस्त्र और आभूषण से श्रृंगार करें। झूलने में विराजित कर के उन्हें झूला झुलाये और उनकी श्रद्धापूर्वक आरती और भजन कर, अंत में पंजीरी, फल, मेवा, मिष्ठान आदि का भोग समर्पित करें और सभी में उनका प्रसाद वितरण करें। यथा संभव व्रत और दान आदि करें। आज के दिन बालकों को उपहार देना भी शुभ माना जाता है।
राशि के अनुसार जन्माष्टमी के विशिष्ट उपाय और मंत्र-
मेष : पूजा में लाल चन्दन और लाल पुष्पों का प्रयोग करें।
ú क्लीं श्रीं लक्ष्मीनारायणाय नम:। मंत्र का जाप करें ।
वृष : सफ़ेद या गुलाबी पोशाक बालगोपाल को पहनायें और मंदिर में रंगोली बनायें।
úगोपालाय उतरध्वाजय नम:। मंत्र का जाप करें ।
मिथुन: हरे रंग से वस्त्र से मंदिर को सजाये और बालको में मिठाई बाटें।
úक्लीं कृष्णाय नम:। मंत्र का जाप करें
कर्क : मंदिर में दूध का दान करें और माखन मिश्री का भोग अवश्य लगवायें।
ú हिरण्यगर्भाय अव्यक्तरूपिणे नम: मंत्र का जाप करें ।
सिंह : मंदिर के द्वार पर तोरण बंाधे और पंजीरी का भोग अवश्य लगवायें।
 ú क्लीं ब्र±मणे जगदधराये नम: मंत्र का जाप करें ।
कन्या : ब्राrाणों को वस्त्र दान करे और द्वाक्षर मंत्र का जाप करें।
ú नम: पीं पीताम्बराय नम: मंत्र का जाप करें ।
तुला : पूजा में इतर और अष्टगंध का प्रयोग करना लाभदायक होगा।
 ú तत्त्व निरंजनाये तारकरमाये नम: मंत्र का जाप करें ।
वृश्चिक : अपने आध्यात्मिक गुरू या किसी विद्वान का संग रह कर ज्ञानार्जन करें।
 ú नारायण सुरसिंघे नम: मंत्र का जाप करें ।
धनु : पीली पोशाक में बालगोपाल को सजाएं और केसर तिलक करे।
ú श्रीं देव कृष्णाय उर्ध्वदन्ताय नम: मंत्र का जाप करें ।
मकर : सफ़ेद चन्दन का तिलक करे और तुलसी की माला पर जाप करे।
 ú श्रीं वत्सले नम: मंत्र का जाप करें ।
 कुम्भ : पूजा में गुलाब के पुष्पों और नारियल को सम्मिलित करें।
 ú श्रीं उपेन्द्राय अच्युताय नम: मंत्र का जाप करें ।
मीन : बालगोपाल का श्रृंगार खुद करें। स्फटिक की माला से जाप करे।
ú आं क्लीं उध्वातय उद्धारिने नम: मंत्र का जाप करें ।

इस पर्व का वैदिक ज्योतिष में भी बहुत महव है। आज के दिन कही गयी पूजा अर्चना उपवास आदि संतान सुख प्राप्त करने में विशेष लाभकारी होते हंै। जन्मपत्रिका में पंचम भाव से संतति योग और पूर्वपुण्य का अवलोकन किया जाता है। इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि सुयोग्य संतान पूर्वपुण्य से ही मिलती है।
संतान सुख हर विवाहित जो़डे की कामना होती है पर कभी कभी कर्मफल के कारण इस सुख को प्राप्त करने में कठिनाई का सामना करना प़डता है। पंचम भाव और भावेश का पाप ग्रहों से ग्रसित होना इसका एक मुख्य कारण होता है। वैदिक ज्योतिष में हर समस्या की जानकारी के साथ उसका समाधान भी समाहित होता है। यदि किसी की पत्रिका में ऎसे दुर्योग हों तो जन्माष्टमी के दिन पूरी श्रद्धा से किया गया व्रत और बालगोपाल की पूजा से संतान सुख में वृद्धि होती है। सुयोग्य संतान की कामना करने वाले दंपतियों या निसंतान दम्पतियों को विशेषत: जन्माष्टमी के दिन संतान गोपाल यन्त्र की स्थापना करके निमAोक्त मंत्र का यथा संभव जाप करना चाहिए।

ú श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:।
 श्रेष्ठ पुत्र संतान की प्राçप्त के लिए -
 देवकी सूत वासुदेव जगत्पते, देहि में तनयं कृष्णं त्वामहं शरणम् गत:।।
इन मंत्रों के साथ में सन्तानगोपाल स्त्रोत का जाप भी जीवन में संतानसुख की वृद्धि करने वाला होता है।
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