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ज्योतिष और आयुर्वेद
सुमन सचदेव
 भगवान सूर्य की पत्नी का नाम संज्ञा था, जो त्वष्टा की पुत्री थीं। पति के तेज को न सह पाने के कारण उन्होंने तपस्या करने का निर्णय लिया। उनकी तपस्या से पति की सेवा में कोई खलल नहीं आए इसलिए उन्होंने अपनी छाया को पति की सेवा के लिए नियुक्त कर दिया तथा अश्वा का रूप धारण कर स्वयं तपस्या करने चली गई। जब भगवान सूर्य को यह ज्ञात हुआ तो उनका ह्वदय संज्ञा के लिए द्रवित हो उठा। अश्व रूप धारण कर वह संज्ञा से मिलने गए। उन्हें संज्ञा से जु़डवा संतानें हई। एक का नाम दस्त्र और दूसरे का नाम नासत्य रखा गया। संयुक्त रूप से इन्हें अश्विनी कुमार के नाम से जाना जाता है। यही अश्विनी कुमार देव वैद्य अश्विनी कुमार हैं। ये स्मरण मात्र से पास पहुंच जाते हैं तथा अपने चिकित्सीय ज्ञान से संकट को तुरंत दूर कर देते हैं। इन्होंने शयु ऋषि की वन्ध्या गाय का उपचार किया, इन्द्र द्वारा काटे गए दध्यङग्ाथर्वण ऋषि के सिर को पुन: जो़डा। अगस्त्य ऋषि की पत्नी विश्पला की कटी जंघा के स्थान पर लोहे की जंघा लगाई तथा उसे चलने-फिरने योग्य बनाया। इन्होंने ही च्यवन ऋषि का उपचार कर उन्हें जर्जर वृद्ध से स्वस्थ तरूण में बदल दिया। इन उदाहरणों से आयुर्वेद की ऊंचाइयों का ज्ञान होता है, जिसे ब्रrाा जी ने दक्ष को एवं दक्ष ने अश्विनी कुमारों को प्रदान किया।

ज्योतिष शास्त्र में 27 नक्षत्रों में से प्रथम नक्षत्र अश्विनी नक्षत्र है। इस नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता अश्विनी द्वौ हैं। इस नक्षत्र में जन्मे जातकों में नैसर्गिक उपचार करने की अद्भुत क्षमता पाई जाती है, फिर रोग चाहे शारीरिक हो या मानसिक। इस नक्षत्र में जन्मे जातकों के साथ अश्विनी कुमार का आशीर्वाद होता है। अधिकांशत: यह देखा गया है कि चिकित्सा के क्षेत्र में इस नक्षत्र के व्यक्ति अधिक सक्रिय होते हैं। भगवान वेदव्यास ने चार प्रकार के रोगों का वर्णन किया है-
1. शरीर - ज्वर कुष्ठ आदि 2. मानस -क्रोध आदि 3. आगन्तुक - चोट आदि 4. सहज - बुढ़ापा

उन्होंने औषधियों में देवताओे का वास माना है। चन्द्रमा को औषधियों के अधिष्ठाता देवता के रूप में प्रतिपादित किया है। पुराणोे में जहाँ आयुर्वेद का वर्णन है, वहीं आयु वृद्धि के उपायों का भी वर्णन है। यह इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि ज्योतिष, धर्म और आयुर्वेद एक-दूसरे में पूर्णत: गुंथे हुए हैं। पुराणों में यह वर्णन कई जगह मिलता है कि आयुर्वेदाचार्यो को ज्योतिष का पूर्ण ज्ञान होता था जिसका प्रयोग रोग की पहचान, औषधि प्रारम्भ करने के शुभ मुहूर्तादि के लिए किया करते थे। अथर्ववेद मेे आयुर्वेद का वर्णन है। रोगों के प्रकारों का वर्णन करते हुए इनके दो प्रकार बताए गए हैं-

1. पापजनित 2. आहारादि जनित

पापजनित रोगों के लिए दैवव्यपाश्रय उपचार का उल्लेख है, जिसमें मंत्र, रत्न धारण, होम, प्रायश्चित्त, उपवास, दान, तीर्थयात्रा आदि सम्मिलित हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ग्रहों के सहारे न केवल रोगों की पहचान की जाती थी अपितु इलाज भी होता था। यह इलाज तभी संभव हो सकता है, जब वैद्यों को ज्योतिष का भी पर्याप्त ज्ञान होता था। आयुर्वेद के त्रिदोष सिद्धांत में कफ, वात एवं पित्त होते हैं। ज्योतिष में नवग्रहों को इन तीन श्रेणियों में बाँटा गया व मेडिकल एस्ट्रोलोजी में इनका प्रयोग शरीर एवं रोग की प्रकृति को जानने के लिए किया जाता है। जिस प्रकार आयुर्वेद में ज्योतिष का उल्लेख है, उसी प्रकार ज्योतिष शास्त्र के कुछ श्लोकों में आयुर्वेद के नुस्खों का सुंदर प्रयोग किया गया है।

"चन्द्र: सम्पूर्णतनु: शुक्रेण निरीक्षित: सुह्वjागे। रिष्टहराणां श्रेष्ठे वातहराणां यथा बस्तिH"

 अर्थात- यदि पूर्ण चन्द्रमा मित्र के नवांश में स्थित हो व शुक्र से दृष्ट हो तो अरिष्ट दूर करने वालों में श्रेष्ठ होता है- अर्थात् अरिष्ट का विनाश ऎसे करता है जैसे वायु रोग हरण में बस्ति क्रिया श्रेष्ठ होती है। परमोच्चो शिशिरतनुभृगुतनयनिरीक्षितो हरति रिष्टम्। सम्यग्विरेकवमनं कफपित्तानां यथा दोषम्H चन्द्र शुभवर्गस्थ: क्षीणोùपि शुभेक्षितो हरति रिष्टम्। जलमिव महातिसारं जातीफलवल्कलक्वथितम्H यदि चन्द्रमा अपने परमोच्चा वृषभ राशि के अंश 3 पर स्थित हो और शुक्र से दृष्ट हो तो अरिष्ट का नाश करता है, जैसे कफ व पित्त के दोष को विरेक (जुलाव) व वमन (उल्टी) नाश करता है। यदि क्षीण भी चन्द्रमा शुभ ग्रहों के वर्ग में, शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो अरिष्ट का नाश करता है- जैसे जायफल के छिलके का `ाथ (काढ़ा) महातिसार रोग का विनाश करता है।...
 सप्ताष्टमषष्ठस्था: शशिन: सौम्या हरन्त्यरिष्टफलम्। पापैरमिश्रचारा: कल्याणघृतं यथोन्मादम्H युक्त: शुभफलदायिभिरिन्दु: सौम्यैर्निहन्त्यरिष्टानि। तेषामेव ˜यंशे लवणविमिश्रं घृतं नयनरोगम्H

 यदि चन्द्रमा से 7, 8, 6 भावों में पापग्रह से रहित शुभग्रह हों तो अनिष्ट का नाश करते हैं, जैसे उन्माद रोग का नाश कल्याण घृत करता है। यदि चन्द्रमा शुभफल देने वाल े शुभग्रह से युत हो और शुभग्रह के द्रेष्काण में हो तो अरिष्ट का नाश करता है, जैसे लवण से युत घृत नेत्र रोग (दर्द) का (पाठान्तर से नमक गर्म पानी में मिलाकर कान में भरने से कान के रोग या दर्द) नाश करता है। आपूर्यमाणमूर्तिर्द्वादशभागे शुभस्य यदि चन्द्र:। रिष्टं नयति विनाशं तक्राभ्यासो यथा गुदजम्H यदि जन्मांग में चन्द्रमा पूर्ण बिम्ब से युत होकर शुभ ग्रह के द्वादशांश में हो तो अरिष्ट का विनाशक होता है, जैसे तक्रक (मठा) के सेवन से गुदा रोग (बवासीर) नष्ट होता है।
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