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भारतीय सर्वप्रथम खगोल के ज्ञाता
खगोल विज्ञान वह शास्त्र है, जिसमें ब्रrााण्ड में स्थित विभिन्न पिण्डों के बारे में अध्ययन किया जाता है। मनुष्य ने जब अन्तरिक्ष में सूर्य, चन्द्र, तारों को देखा तभी उसमें इसके विषय में अधिक जानने की उत्सुकता पैदा हुई। प्रागैतिहासिक काल में ही हमारे पूर्वजों ने सूर्य, चन्द्र व अन्य खगोलीय पिण्डों को ध्यान से देखा तथा तारों को नक्षत्रों एवं राशियों में समूहबद्ध कर लिया था।
वेद जो कि पृथ्वी पर सबसे प्राचीन ग्रंथ माने जाते हैं, उनमें लिखा है कि -
वेदा हि यथार्थमभिवृता: कालानुपूर्वा विहिताpयज्ञा।
तस्मादिदं काल विधान शास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञमा।।
अर्थात् यज्ञ के प्रारंभ से लेकर उसके समाप्त होने तक सफलता की प्राçप्त के लिए यह आवश्यक है कि ग्रहों की गति को समझकर तथा उन्हें ही आधार बनाकर यज्ञ का आरंभ किया जाए तो ऎसे यज्ञ के सफल होने के अवसर सर्वाधिक होते हैं।
दूसरे शब्दों में कहें तो यज्ञादि कर्मो का प्रारंभ मुहूर्त देखकर करने को कहा गया। कालान्तर में यह परम्परा प्रत्येक शुभ कार्य को मुहूर्त देखकर करने की शुरू हो गयी।
आज भी शहरों के अलावा गाँवों में भी अनपढ़ से अनपढ़ व्यक्ति भी पंडित जी के पास जाकर मुहूर्त पूछता है कि पंडित जी फला तिथि को चंद्रमा कैसा हैक् यह परिपाटी-परम्परा युगों से हमारे देश में चली आ रही है।
किसी भी जातक के जन्म, उपनयन संस्कार, दीक्षा ग्रहण, व्यापार आरम्भ, विवाह, गृह प्रवेश, मृत्यु आदि सभी संस्कारों में ग्रहों की स्थिति अथवा मुहूर्त एक विशिष्ट महत्व दर्शाते हैं। मुहूर्त साधन भी बिना खगोल एवं ज्योतिष के ज्ञान के असंभव है।
वाल्मीकि कृत आदि रामायण में यह उल्लेख मिलता है कि दशरथ ने अपने कुल पुरोहित वशिष्ठजी से कहा कि राम का राज्याभिषेक शीघ्र करवा दिया जाए क्योंकि आपके अनुसार उनकी राहु की दशा का आरंभ होेने वाला है। तब गुरू वशिष्ठ ने अभिषेक के लिए पुष्य नक्षत्र का शुभ मुहूर्त निकाला क्योंकि भगवान श्रीराम का जन्म नक्षत्र पुनर्वसु था, इसलिए पुनर्वसु से द्वितीय नक्षत्र होने के कारण पुष्य को शुभ नक्षत्र माना गया।
इसी प्रकार जब महाराज दशरथ के ज्योतिर्विदों ने उन्हें अवगत कराया कि कुछ समय पpात् शनि रोहिणी नक्षत्र से गमन करेंगे तो यह स्थिति रोहिणी शकट भेदन की होगी, जिसके फलस्वरूप बारह वर्ष तक पृथ्वी पर घोरतम अकाल (दुर्भिक्ष) प़डता है, जिसका अंत प्रलय से होता है तो महर्षियों और गुरूओं का आशीर्वाद प्राप्त कर, उनके निर्देशानुसार प्रजावत्सल महाराज दशरथ शनि को इस संहार से रोकने के लिए रथारूढ़ होकर नक्षत्र लोक में जा पहुंचे।
जब वार्तालाप से शनि अनुकूल नहीं हुए तो राजा दशरथ ने शनि पर आक्रमण किया। तब शनि राजा दशरथ की कत्तüव्यनिष्ठा तथा उनके पराक्रम से अत्यंत प्रभावित हुए और उनसे परदान मांगने को कहा। महाराज दशरथ ने शनि से सूर्य तथा अन्य ग्रहों के होते हुए कभी रोहिणी का शकट भेद न करने की विनती की। इस पर शनि ने राजा दशरथ को कहा कि वे अपने मार्ग पर सावधानी से ही बढ़ेंगे, ऎसा न करने का वचन दिया।
इसी प्रकार इच्छा मृत्यु प्राप्त भीष्म पितामह ने भी महाभारत में अर्जुन के तीरों से छलनी हो जाने पर भी तब तक अपने प्राण नहीं त्यागे जब तक कि सूर्य उत्तरायण में नहीं आ गये क्योंकि उत्तरायण में प्राण त्यागना शुभ माना जाता है। उत्तरायण में किए गए अधिकांश प्रक्षेपण सफल हुए हैं। राम और रावण का युद्ध तथा कौरव व पाण्डवों का युद्ध अमावस्या को प्रारम्भ किया गया था क्योंकि अमावस्या युद्ध के लिए प्रशस्त मानी गयी है। कह सकते हैं कि हमारे देश में खगोल एवं ज्योतिष का गंभीर ज्ञान उपलब्ध था। प्राचीन काल में विद्वान ऋçष्ायों या गुरूओं के आश्रम में योग, विद्या एवं अन्वेषण के द्वारा प्रत्येक शास्त्रों और उनके विषयों पर गहराई से अध्ययन किया जाता था। यह अध्ययन बहुत समय तक चलता था, उसके पpात् निष्कष्ाü निकालकर सिद्धांतों का प्रतिपादन किया जाता था। जातक के जातकर्म संस्कार से लेकर विवाह तक के संस्कारों का उल्लेख भविष्य पुराण में मिलता है।
पुरूष का जातकर्म संस्कार वैदिक मंत्रों से बालक को सुवर्ण, मधु और घृत का प्राशन करवाकर किया जाता है। नामकरण संस्कार दसवें, बारहवें, अठारहवें दिन या एक मास पूर्ण होने पर शुभ तिथि व मुहूर्त देखकर करना चाहिए। जन्म से बारहवें दिन या चतुर्थ मास में बालक को घर से प्रथम बार निकालना चाहिए, इसे निष्कमण कहते हैं। छठे मास में बालक का अन्नप्राशन संस्कार करवाना चाहिए। पहले या तीसरे वर्ष में मुण्डन संस्कार होना चाहिए। गर्भ से आठवें वर्ष में ब्राrाण का, ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय का, बारहवें वर्ष में वैश्य का यज्ञोपवीत संस्कार किया जाना चाहिए। यज्ञोपवीत संस्कार के पpात् गुरूमंत्र ग्रहण कर बालक का अध्ययन का कार्य करें तथा केशान्त (समावर्तन) संस्कार होने तक बालक गुरू के घर पर ही रहे और गुरू की सेवा करते हुए वेदाध्ययन करे।
समावर्तन के पpात् योग्य स्त्री के साथ शुभ मुहूर्त में विवाह करके गृहस्थ धर्म का पालन करे। इस प्रकार का विधिवत क्रमानुसार जीवन चक्र का निर्धारण सिर्फ भारतवर्ष में ही, हमारे ऋषियों के प्रयासों से ही संभव हुआ। अन्यत्र पूरे विश्व में कहीं भी आकाशीय पिण्डों अर्थात् ग्रहों, नक्षत्रों का इतना सम्मान करते हुए, उनसे आज्ञा लेते हुए अपने जीवन के प्रमुख कर्मो जैसे जन्म, यज्ञोपवीत, शिक्षा-दीक्षा, व्यापार प्रारंभ, विवाह आदि संस्कारों को किए जाने के दृष्टांत कहीं भी दिखलायी नहीं प़डता। भारतीय खगोल विज्ञान का इतिहास ग्रीक दार्शनिकों एवं खगोलज्ञों से भी बहुत पुराना है। हमारा ज्योतिष एवं खगोल अत्यधिक विकसित था।
ऋषियों को इसकी गहन जानकारी थी, विशुद्ध गणनाएं की जाती थी जिनके लिए वेध की सुगम विधियां बिना दूरदर्शी की सहायता के विकसित की गयी थीं। काल की गणना का जो क्रम था, वह आज भी सटीक भविष्यवाणी करता है, जिसमें ग्रहण के समय को लेकर कई वर्षो पुराने काल को खोजा जा सकता है।
 जो भविष्य पुराण के अनुसार निमA है :
अठारत निमेष : 1 काष्ठ (निमेष पलक गिरने का समय)
30 काष्ठा : 1 कला
30 कला : 1 क्षण
12 क्षण : 1 मुहूर्त
30 मुहूर्त : 1 दिन-रात
30 दिन-रात : 1 माह
2 माह : 1 ऋतु
3 ऋतु : 1 अयन
2 अयन : 1 वर्ष
अर्थात् इस प्रकार की सूक्ष्म गणना करने की विधि भी हमारे ऋषियों के पास मौजूद थी, जिनके प्रयोग द्वारा वे शुभ मुहूर्त व अन्य ज्योतिषीय गणनाएं करते थे।
विदेशियों के आक्रमणों में हमारा बहुत सा साहित्य और ज्ञान पुस्तकालयों में रखी, पुस्तकों एवं ग्रंथों को जलाकर, अन्वेषणों को दबाकर नष्ट कर दिया। इसलिए पिछले कुछ 300 वर्षो से इस विज्ञान में हम पिछ़ड गए हैं।
परंतु जिस प्रकार से वर्तमान समय में पुन: ज्योतिष और अन्य प्राच्य विद्याओं की ओर हमारी नयी पीढ़ी रूख कर रही है। वह दिन दूर नहीं कि जब भारत अपने बुद्धि और ज्ञान के बल पर एक बार फिर विश्व का सिरमौर कहा जाएगा।
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