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विवाह मुहूर्त कम क्यों
(10 दिसंबर 2008 से 11 फरवरी 2009 तक)
 इस वर्ष ग्रह-गोचर अत्यंत विशिष्ट रहेगा जिसके कारण माह जनवरी और आधी फरवरी में विवाह नहीं हो सकेंगे। भारतीय संस्कृति में समय शुद्धि को अत्यधिक महत्व दिया गया है। मान्यताएँ रही हैं कि शुभ समय पर प्रारंभ किए गए कार्य अवश्य सफल होते हैं, उन कार्यो में निहित मनोकामनाएं भी अवश्य पूर्ण होती हैं।
किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ में मलमास, ग्रहण, संक्रांति, अशुभ योग और तिथियाँ तथा चंद्रमा, गुरू और शुक्र ग्रह इनकी शुद्धि और बल आवश्यक रूप से देखा जाता है।
दिनांक 14 दिसंबर 2008 से 14 जनवरी 2009 तक सूर्य धनु राशि में रहेंगे। प्रति वर्ष एक माह की यह अवधि "मलमास" या ""धनु मलमास"" कहलाती है। यद्यपि मीन राशि में सूर्य के रहने पर लगभग 14 मार्च से 14 अप्रैल तक की अवधि भी मलमास कहलाती है अर्थात् जब सूर्य, देवगुरू बृहस्पति की राशि (धनु और मीन) में रहें तो यह अवधि मलमास कहलाती है। इस वर्ष 14 दिसंबर 08 से 14 जनवरी 09 तक मलमास रहने के कारण विवाह तथा अन्य मांगलिक कार्य नहीं किये जा सकेंगे।
जिस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे और मलमास समाप्त होगा, उसी दिन 14 जनवरी 2009 को देव गुरू बृहस्पति भी मकर राशि में अस्त हो जाएंगे तथा 11 फरवरी 2009 को उदय होंगे। विवाह में बृहस्पति देव अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। प्रथम तो ये मकर राशि यानि अपनी नीच राशि में रहेंगे और दूसरा ये अस्त रहेंगे अत: उक्त अवधि में विवाह नहीं हो सकेंगे। मकर राशि में स्थित गुरू और अस्तंगत गुरू का असर किन-किन कार्यो पर प़डता है, उनके संबंध में शास्त्र निर्णय प्रस्तुत है:
""वाक्पतौ मकरराशिमुपैते पाणिपीडनविधिर्न विधेय:।
तत्र दूषणमुशन्ति मुनीन्द्रा: केवलं परमनीच नवांशे।।""

मकर राशि बृहस्पति की नीच राशि है इसलिए इस राशि में वर्गोत्तम नवांश यानि मकर राशि के, मकर नवांश (प्रथम नवांश) में बृहस्पति रहें तब विवाह नहीं करना चाहिए। बृहस्पति मकर राशि में दिनांक 9 दिसम्बर को रात्रि 11:42 बजे प्रवेश करेंगे तथा मकर नवांश में दिनांक 9 दिसंबर 2008 रात्रि 11:42 से 25 दिसंबर 2008 प्रात: 4:42 तक रहेंगे। इस अवधि में विवाह वर्जित हैं। कुछ पंचांगों में 11, 12 और 13 व 14 दिसम्बर, 2008 के विवाह मुहूर्त दिये गये हैं। इन्हें पूर्ण शुद्ध नहीं माना जा सकता।
लल्लाचार्य का मत-
 ""अवंतिदेशे भृगुकच्छ गुर्जरे मरूस्थले दक्षिणमध्यदेशे।
वराडकालि†जर पूर्व मालवे नीचस्थितो देव गुरूर्न शोभन:।।
मालवे सिन्धुदेशे च गौड देशे च कौंकणे।
नीचादिस्थो गुरूर्वज्यो नान्यदेशे कदाचन:।।""

आचार्य लल्ल ने कहा है कि उ”ौन, भृगु, कच्छ, गुजरात, मरूभूमि (राजस्थान), मध्यप्रदेश, मालवा, मालव द्वीप, सिन्धु, गौड और कोंकण देशों में नीचस्थ गुरू अशुभ होते हैं इसलिए शुभ कार्य नहीं किए जाते परंतु अन्य देशों में वर्जित नहीं। नर्मदा के पूर्व दिशा में, शोण नदी के उत्तर में, गण्डकी नदी के पश्चिम हिस्से में मकरस्थ गुरू दोषकारक नहीं माने जाते।
भृगु ऋषि का मत: मकर राशि में बृहस्पति के आने पर प्रारंभिक 60 दिन शुभ कार्यो में शुभ नहीं होते।
भीम पराक्रम: -
 ""कार्ये मकरगे नीचे विवाहाद्यखिलं बुधै:।
नतु सिंहगते जीवे कुर्वाणो मृत्युमाप्नुयात्।।""

इनका मत है कि विवाह आदि समस्त मांगलिक कार्य बृहस्पति के मकर राशि में होने पर किए जा सकते हैं लेकिन बृहस्पति के सिंह राशि में स्थित होने पर नहीं किए जा सकते।
अन्य मत:
""अन्यानि शुभ कार्याणि जीवे वक्रातिचारिणी।
विवज्र्यानि विवाहस्ते कार्य त्वांगलवं बिना।।""

जब बृहस्पति मकर राशि में या अतिचारी होते हैं तब बृहस्पति का अशुभ नवांश (मकर नवांश) त्यागकर विवाह किया जा सकता है क्योंकि नीच राशि में होने पर शुभ कार्यो में तो शुभ होते हैं परंतु विवाह तभी करना चाहिए जबकि बृहस्पति नीच नवांश में नहीं हों।
टोडरानन्द:
 ""अतिचारे सप्तदिनं वक्रे द्वादशमेव च।
नीचस्थितेपि वागीशे मासमेकं विवर्जयेत्।।""

टोडरानन्द ग्रंथ का मत है कि बृहस्पति के अतिचारी होने पर सात दिन तक, वक्री होने पर बारह दिन तक और नीच राशि मकर में आने पर एक मास तक शुभ कार्य नहीं करने चाहिएं।
वर्ष 2009 में बृहस्पति दिनांक 15 जून, 2009 को वक्री होंगे एवं 13 अक्टूबर 2009 को मार्गी होंगे। इस आधार पर 15 जून से 22 जून 09 तक 7 दिन शुभ कार्यो में वर्जित रहेंगे।
बृहस्पति 9 दिसंबर को नीच राशि में आयेंगे अत: 9 जनवरी 2009 तक शुभ कार्य वर्जित रहेंगे।

गरू़ड पुराण:
""यदा सिंहगतो जीवौ नैव कल्याणमाचरेत्।
मकरस्थेùपि कत्तüव्य नात्र कार्या विचारिणा।।""

जब सिंह राशि में गुरू रहें तब शुभ काम नहीं करने चाहिए परंतु मकर राशि में होने पर नि:संदेह होकर करने चाहिएं।
इस वर्ष मकर राशि में बृहस्पति के स्थित रहने के दोष का परिहार तो स्वत: ही इसलिए हो जायेगा क्योंकि इस अवधि में मलमास रहेगा लेकिन जातकर्म संबंधी कार्य किए जा सकते हैं क्योंकि ये कार्य दिनों पर आधारित होते हैं।
मुहूर्त चिंतामणि:
""अस्ते वज्र्य सिंहनक्रस्थ जीवे वज्र्य केचिद्वक्रगे चातिचारे।
गुर्वादित्ये विश्वघस्त्रेùपि पक्षे प्रोचुस्तद्वद्न्तरत्नादि भूषाम्।।""

गुरू के अस्त रहने पर जो कार्य वर्जित होते हैं उन कार्यो को बृहस्पति के सिंह राशि या मकर राशि में होने पर भी वर्जित मानना चाहिए। आचार्य वराह के मतानुसार सार्वजनिक उद्यान का निर्माण, मुण्डन संस्कार, व्रत बन्ध, दीक्षा लेना, विवाह, यात्रा, वधू का द्विरागमन या गृह प्रवेश, नूतन गृह-प्रवेश, कुआँ, बाव़डी का निर्माण, देवताओं की प्राण-प्रतिष्ठा आदि कार्य बृहस्पति के अस्त रहने पर नहीं किये जाते, उसी प्रकार गुरू के नीच राशि व नवांश में तथा सिंह राशि में रहने पर भी उपरोक्त कार्य नहीं किए जाते।
शास्त्रों का मत है कि बृहस्पति जब अस्त रहें तब सार्वभौम रूप से शुभ कार्यो पर प्रतिबन्ध होता है, उसी प्रकार बृहस्पति के सिंह राशि में होेने पर एवं नीच राशि मकर के प्रथम (मकर) नवांश में होने पर शुभ कार्यो पर प्रतिबंध रहता है। इस आधार पर ही दिनांक 10 दिसंबर 2008 से 11 फरवरी 2009 तक नूतन गृह आरंभ, नूतन गृह-प्रवेश तथा विवाह एवं ब़डी यात्रा का प्रारंभ आदि ये सभी कार्य नहीं किये जा सकेंगे।
मकर राशि में गुरू कमजोर अवश्य होते हैं परंतु त्याज्य तभी होते हैं जबकि नीच राशि में, नीच नवांश में भी हों। इस अवधि में बसंत पंचमी जैसे कुछ ब़डे पर्व और मुहूर्त भी आएंगे। कुछ विद्वान 31 जनवरी, 2009 को बसंत पंचमी का अबूझ सावा मानते हुए विवाह कर लेने की सलाह दे रहे हैं परंतु यह सर्वथा शास्त्र विरूद्ध है। बृहस्पति अस्त हों तो कोई भी हिन्दू विवाह नहीं कर सकता, चाहे वह दुनिया में कहीं भी रहे लेकिन सिंह व मकर राशि में बृहस्पति स्थित हों तो केवल मध्य भारत में ही शुभ कार्य त्याज्य होते हैं। इसलिए दिनांक 10 दिसंबर 2008 से 11 फरवरी 2009 तक विवाह, शिलान्यास, नूतन गृह प्रवेश, देव प्रतिष्ठा आदि कार्य नहीं हो सकते।
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