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पहला सुख निरोगी काया होती है। देह ह्वष्ट-पुष्ट है व स्वस्थ है तो व्यक्ति अपने कर्मो से अप्राप्य को प्राप्य और असंभव को संभव बना देता है। जो प्राप्त करता है, उसका उपभोग व उपयोग भी समुचित प्रकार से कर सकता है, शरीर अस्वस्थ हो तो चाहे कितनी भी धन-संपदा हो वह उसी प्रकार व्यर्थ होती है, जिस प्रकार बिना अभ्यास के विद्या विष तुल्य होती है। इसलिए कहा है कि "लग्नेश और लगA बली हों तो अनेक अरिष्टों का नाश करते हैं और बलहीन हों तो अनेक शुभ योगों का नाश करते हैं।" जन्मकुण्डली में लगA का उतना ही महत्व होता है जितना शरीर में सिर का होता है। सिर हीन शरीर जैसे किसी काम का नहीं, उसी प्रकार लगA निर्बल हो तो कुण्डली के योग भी व्यर्थ हैं। किसी जातक की जन्मकुण्डली का जब अध्ययन करते हैं तो सर्वप्रथम लगA व लगAेश तथा चन्द्रमा का विचार किया जाता है। इनका विचार इस तरह किया जाता है- 1. लग्नेश केन्द्र या त्रिकोण में हो, अस्त नहीं हो, अपनी उच्चा राशि या स्व राशि में हो तथा लगA में सौम्य ग्रह हों अथवा लगA और लगAेश दोनों बली हों। शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हो तो जातक स्वस्थ शरीर वाला और दीर्घायु होता है। उसका शरीर सुन्दर अंगों से युक्त, बलवान एवं निर्भय तथा अच्छे संस्कार युक्त कुटुम्ब वाला होता है। 2. लग्नेश बलवान होकर शुभ स्थान (केन्द्र या त्रिकोण) में, उच्चा, मित्र या स्वराशि में हो तो जातक सुखी, पराक्रमी, निरन्तर उन्नति करने वाला एवं उत्तम सुखों का उपभोग करते हुए जीता है। 3. लगAेश का तृतीयेश से संबंध हो और एक-दूसरे की राशि में हों तो जातक स्वस्थ शरीर से युत, साहसी, धैर्यवान, वीर और भाइयों का प्रेमी होता है। 4. चतुर्थेश और चन्द्रमा बलवान हों। शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हों तथा चतुर्थ स्थान में शुभ ग्रह हों तो जातक पर माँ की कृपा होती है। 5. यदि लगAेश, षष्ठेश से अत्यधिक बली हो और लगAेश शुभ राशि व अंश में हो और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो और चतुर्थेश बलवान होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो तो जातक दृढ़ व बलवान शरीर वाला, निरोगी और भाग्यवान होता है। 6. यदि षष्ठेश निर्बल होकर 6, 8, 12वें भाव में हो, नीच राशि में हो या अस्त हो तथा लगAेश हो और सूर्य नवम् भाव में हो तो जातक अपने पराक्रम और साहस से शत्रु पर विजय प्राप्त करता है। यदि छठे भाव में शुभ ग्रह हों तो भी जातक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। 7. जन्म लग्न का अष्टमेश यदि केन्द्र के अतिरिक्त भाव में हो और लगAेश, अष्टमेश से बली हो अर्थात् अष्टमेश दुर्बल हो तो जातक को सामान्य व्याधियां तो प्रभावित ही नहीं करतीं, ब़डी व्याधियों को भी अपने पराक्रम व साहस से दूर कर देता है तथा दु:ख व पी़डाओे से मुक्त लम्बी आयु वाला होता है। 8. जन्म लगA से दशम में शुभ ग्रह हों और दशमेश बलवान होकर अपनी राशि में हो अथवा अपनी राशि में स्थित होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो अथवा लगAेश बली होकर दशम् में स्थित हो तो जातक राजा के समान सुखों का उपभोग करता है तथा दीर्घायु होता है। 9. लग्नेश नैसर्गिक रूप से चाहे शुभ हो या क्रूर, वह जिस भाव में हो उस भाव के शुभ फलों को बढ़ाता है। जैसे अष्टम् अति अशुभ स्थान है परन्तु अष्टमेश ही यदि लगAेश भी हो तो वह शुभ हो जाता है। 10. लगAेश शुभ राशि में हो तथा शुभ ग्रह से दृष्ट हो अथवा गोपुरांश में हो तो 16वें वर्ष से सुख प्रारम्भ होता है। 11. लग्नेश जिस नवांश में हो उस नवांश का स्वामी उच्चा राशि का होकर लगA से केन्द्र-त्रिकोण में हो या बलवान होकर लाभ भाव में हो तो 30वें वर्ष से सुख मिलता है। 12. लगA या लगAेश को जितने अधिक ग्रह देखें उतना ही देह का सुख होता है। 13. लगAेश, बुध, गुरू अथवा शुक्र यदि केन्द्र त्रिकोण मेे हो तो जातक दीर्घायु एवं स्वस्थ होता है। 14. लगAेश चर राशि में होकर शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो जातक सुखी होता है। 15. चंद्रमा के साथ बुध-गुरू या शुक्र लग्न या केन्द्र में हो तो जातक सुखी होता है। स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है। 16. लगAेश लगA में, द्वितीय भाव में या तृतीय भाव में हो तो स्वास्थ्य के लिये लाभदायक होता है। 17. लगA से नवम् भाव मेे बुध-शुक्र-शनि एक ही अंश (नवांश) में हों अथवा बुध, शुक्र और शनि लगA में एक ही नवांश में हो तथा 6 या 8 वें भाव में चंद्रमा हो तो जातक अति दीर्घायु होता है और स्वस्थ होता है। 18. नवमेश नवम में स्थित होकर, मंगल के नवांश में स्थित चंद्र से दृष्ट हो तो जातक अति दीर्घायु होता है। उपरोक्त योगों में से जितने अधिक योग जन्मकुण्डली में मिलें, उतना ही अच्छा स्वास्थ्य होता है। कुण्डली में जो ग्रह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हों, उनके अनिष्ट प्रभावों को शांत करने के लिए ग्रहों के तथा देवताओं के मंत्रों का जाप करना चाहिये। इस प्रकार जो ग्रह अनिष्टकारी होंƒ उनके अनिष्ट प्रभावों की शांति के लिए ग्रह के मंत्र तथा तत्संबंधी देवता की उपासना करनी चाहिये।
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