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रत्न का प्रभाव

रत्न अथवा नग एक विशेष रंग, परिमाण व आकृति-युक्त होते हंै तथा इस प्रकार धारण किये जाने चाहिएं कि पहनते समय वह शरीर को छुएं। नग के द्वारा सूर्य की किरणें संबंधित ग्रह के रंग से परावर्तित होकर अत्यधिक तीव्र गति व मात्रा में शरीर के अंदर प्रविष्ट होकर अपना प्रभाव छो़डती हैं जिससे जातक उससे संबंधित गतिविधियाँ करने लगता है। प्रत्येक ग्रह का अपना विशेष रंग होता है। सूर्य की किरणें संबंधित ग्रह से टकराकर उसी रंग में परावर्तित होकर अनवरत रूप से पृथ्वी पर आती रहती हैं।

आपने जल चिकित्सा का नाम अवश्य सुना होगा। एक ही प्रकार के जल को विभिन्न रंगों की बोतलों में भर कर सूर्य की रोशनी में रखा जाता है। सूर्य की किरणें विभिन्न रंगों में से आर-पार जाकर बोतलों में रखे एक ही प्रकार के जल पर भिन्न-भिन्न प्रभाव डालती हैं। जल चिकित्सा विशेषज्ञ भिन्न-भिन्न रोगों की चिकित्सा उस जल से करते हैं। यह प्रभाव ठीक उसी प्रकार जल पर प़डता है जैसे हम जिस भी रंग का चश्मा आंखों पर पहनेगें उसी रंग का हमें दिखाई देता है।

कम्प्यूटर के इस युग में फ्लॉपी से सभी वाकिफ हैं। जब उसे फॉर्मेट किया जाता है तो वह अनेक सेक्टरों में विभाजित होती है, ठीक उसी प्रकार जब बच्चाा माँ के संपर्क से हटकर प्रकृति के संपर्क में आता है तो ब्रrााण्ड में व्याप्त अनेक महत्वपूर्ण ग्रह (जो स्वयं भिन्न-भिन्न रंगों के होते हैं तथा सूर्य की किरणों को उसी रंग में परावर्तित कर पृथ्वी पर अनवरत रूप से भेजते रहते हैं) बच्चो के शरीर को अपनी-अपनी शक्ति (दूरी, दिशा, कोण आदि के आधार पर) के अनुसार विभिन्न सेक्टरों में विभाजित कर उन पर अपना अधिकार कर लेते हैं। जब-जब भी संबंधित ग्रह की दशा-अन्तर्दशा आदि आती है अर्थात् वह ग्रह प्रभावी होता है तो ग्रह विशेष से संबंधित सेक्टर क्रियाशील हो उठता है तथा जातक ग्रह विशेष के कारकत्वों से संबंधित क्रियाएं करने लगता है।

जातक के द्वारा की जाने वाली गतिविधियों को हम निम्न प्रकार से जान सकते हैं -

1. जन्मकुंडली में ग्रह की स्थिति।

2. ग्रह की दशा-अन्तर्दशा।

3. ग्रह की गोचरस्थ स्थिति।

यदि ग्रह की स्थिति किसी भी प्रकार से कमजोर है अर्थात् ग्रह कम प्रभावी है तो उस ग्रह को बली करने के लिए उस ग्रह से संबंधित रत्न जातक को धारण कराया जाता है तथा उस ग्रह से संबंधित वस्तुओं का प्रयोग करने की सलाह दी जाती है।

यदि कोई ग्रह बली है तो उस ग्रह के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए अमुक ग्रह से संबंधित रत्न (नग) को धारण करने की सलाह नहीं दी जाती है बल्कि उस ग्रह से संबंधित वस्तुओं का दान करने तथा उन वस्तुओं के प्रयोग न करने की सलाह दी जाती है, जिससे उस ग्रह से होने वाले नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सके।

सभी ने यह अनुभव किया होगा कि छोटे-छोटे बच्चो शीशे के टूटे हुए टुक़डों को सूर्य की तरफ रखकर उसके नीचे कागज अथवा बी़डी के टुक़डों को जला लेते हैं क्योंकि सूर्य की किरणें शीशे में से निकल कर और अधिक तीव्र हो जाती हैं।

कमजोर नेत्रों वाले विशेष आकार तथा कोण पर बनाए गए शीशे के चश्मों से साधारण चश्मों की अपेक्षा अधिक अच्छा देख पाते हैं क्योंकि नेत्र-ज्योति विशेष आकृति युक्त शीशों से निकलकर और अधिक तीव्र हो जाती है। ठीक इसी प्रकार साधारण नगों की तुलना में विशेष आकृति से युक्त नगों में से उससे संबंधित ग्रह की किरणें और अधिक तीव्र होकर (शरीर से छुए होने के कारण) शरीर के अंदर प्रविष्ट होकर उस ग्रह से संबंधित कमी को दूर कर देती हैं तथा जातक उसी प्रकार की गतिविधि करने लगता है।

सलाह : विशेष ग्रह से संबंधित नग (रत्न) को धारण करना ही हितकर होता है। अनेक नगों को एक साथ धारण करना कॉकटेल की तरह सदैव हानिकारक होता है अत: किसी योग्य व्यक्ति से परामर्श करके ही किसी विशेष परिस्थिति में ग्रह विशेष से संबंधित उचित भार व परिमाण का रत्न धारण करना चाहिए।

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