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शनि का मिथुन राशि में गोचर
शनि गत वष्ाü 23 जुलाई 2002 को 8 बजकर 08 मिनट पर मिथुन राशि में प्रवेश किया। 08 जनवरी 2003 को 13 बजकर 59 मिनट पर वक्री होकर वृषभ राशि में प्रवेश किया। शनि पुन: 7 अप्रेल 2003 को 20 बजकर 11 मिनट पर मिथुन राशि में प्रवेश करेगा और वर्ष के अन्त तक मिथुन राशि में ही रहेगा। शनि के मिथुन राशि में पुन: प्रवेश के कारण शनि के पाया में परिवर्तन आ जाएगा। इसलिये उसके फल में भी परिवर्तन हो जाएगा। शनि का मिथुन राशि में गोचर हम पिछले वर्ष भी लिख आए हैं पर पाया परिवर्तन के कारण हम पुन: शनि के गोचर का फल संक्षिप्त में लिख रहे हैं।
गोचर वश शनि जब मिथुन राशि में प्रवेश करता है तो राष्ट्रीय स्तर पर देश की पूर्व-पश्चिम दिशा के प्रदेशों पर उसका प्रभाव पडता है। उन प्रदेशों में दुर्भिक्ष, अराजकता, कलह, अनाज की कमी, जनता दुखी होती है।

साढेसाती विचार -
  वृष राशि वालों के लिए शनि की साढे साती पांव पर उतरती हुई अर्थात्् अन्तिम चरण पर होगी। मिथुन राशि वालों की शनि की साढे साती ह्वदय पर अर्थात् मध्यम अवस्था में होगी। कर्क राशि वालों की शनि की साढे साती मस्तिष्क पर अर्थात आरम्भिक अवस्था में होगी।
ढैय्या विचार - मिथुन राशि में शनि रहने पर मीन से चतुर्थ व वृश्चिक से अष्टम भाव में होने से उन राशि वालों पर ढैय्या का फल प्राप्त होगा।
शनि की साढे साती के फलस्वरूप जातक को घरेलू एवं व्यवसायिक परेशानियाँ आर्थिक उलझने, खर्च अधिक, धनहानि, रोग, बनते कार्यो में रूकावटे, शत्रुमय आदि अशुभ घटनाएं पैदा होती है।
शनि की ढैय्या के फल स्वरूप कलह-क्लेश निकट के बन्धुओं से वैमनस्य, अपव्यय व धन संबंधी परेशानियाँ, मानसिक तनाव, शारीरिक रोग, शत्रुभय, वृथा भ्रमण आदि अशुभ परिस्थितियाँ पैदा हो जाती है।
परन्तु शनि की साढेसाती या ढैय्या का प्रभाव सदैव अशुभ नहीं होता है। शनि का प्रभाव जन्म कुण्डली में शनि की स्थिति एवं दशान्तर्दशा पर निर्भर करता है। शनि का अशुभ प्रभाव जातक की जन्म कुण्डली एवं नवांश कुण्डली में शनि की अशुभकारी स्थिति से होता है। ज्योतिष के सामान्य सिद्घान्तों के अनुसार शनि जब अपनी उच्चा राशि, मित्र राशि या अपने नवांश में एवं वर्गोत्तम होने की स्थिति में शुभफल देता है। शनि जन्म कुण्डली के शनि से 3, 6, 10, 11 भावो में भी शुभफल देता है। जन्म कुण्डली के चन्द्रमा से भी शनि 3, 6, 11 भाव में अशुभ फल नहीं देता है। जिस ग्रह के साथ शनि का संबंध सम रहता है उसकी राशि से गोचर करने के समय भी अशुभ फल नहीं देता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मकर व कुंभ राशि वालों के लिए साढेसाती बिल्कुल कष्टकारी नहीं होती है यानि शनि का फल इस गोचर में कष्टकारी नहीं होता है।
साढे साती की शुभता या अशुभता इस बात पर भी निर्भर करती है कि शनि की साढेसाती किस पाये में प्रवेश हुई है। पाये के निर्धारण में यह देखना होता है कि शनि जिस दिन राशि परिवर्तन करता है उस दिन चन्द्रमा जन्म कुण्डली की स्थिति से कहाँ है। यदि जन्म कुण्डली के चन्द्रमा से राशि परिवर्तन के समय चन्द्रमा 1, 6, 11 भाव में स्थित हो तो स्वर्ण पाया, 2, 5, 9 भाव में स्थित हो तो रजत/चांदी का पाया, 3, 7, 10 भाव में स्थित हो तो तांबे का पाया, 4, 8, 12 भाव में स्थित हो तो लोहे का पाया होता है। लोहे के पाये को छोडकर अन्य पायो में शुभफल देता है। 7 अप्रेल 2003 को मार्गी शनि मिथुन राशि में प्रवेश करेगा। अतएवं मेषादि राशियों पर शनि का पाया इस प्रकार रहेगा:-
मेष, कन्या, मकर राशि पर रजत पाया शुभ
वृष, कर्क धनु राशि पर सोने का पाया मिश्रित
मिथुन, तुला, कुंभ राशि पर लोहे का पाया अशुभ
सिंह, वृश्चिक, मीन राशि पर ताँबे का पाया शुभफल दायक रहेगा।
मिथुन राशि में शनि व पाये का फल
मेष राशि - वर्ष के आरम्भ से 7 अप्रेल तक शनि की साढेसाती का प्रभाव होने से मानसिक तनाव व आर्थिक परेशानियाँ रहेगी। 8 अप्रेल के बाद धन लाभ व उन्नति होगी।
वृष राशि - शनि की उतरती साढेसाती होने के कारण व स्वर्ण पाया होने के कारण पूर्वार्द्घ भाग में आर्थिक परेशानिया रहेगी व कुटुम्ब में कलह रहेगा। उत्तरार्ध में बिगडे कामों में सुधार के योग है।
मिथुन राशि - शनि के चन्द्रमा के ऊपर से गोचर करने के कारण एवं पाया होने के कारण अपव्यय मानसिक तनाव व बनते कार्यो में रूकावट आएगी।
कर्क राशि - चन्द्रमा से शनि बाहरवें भाव में होने के कारण साढेसाती आरम्भ हो रही है। सोने का पाया होने के कारण घरेलू एवं व्यवसाय संबंधी परेशानियों का सामना करना पडेगा।
सिंह राशि - शनि एकादश भाव में होने के कारण तीसरी दृष्टि से चन्द्रमा को देखेगा। इस कारण संघर्ष करना पडेगा। तांबे का पाया होने के कारण शुभ है।
कन्या राशि - चन्द्रमा से शनि दशम भाव में स्थित होने के कारण व चांदी का पाया होने से शुभ होते हुए भी व्यवसाय के संबंध में विशेष ध्यान देना होगा।
तुला राशि - चन्द्रमा से शनि शुभ भाव नवम में स्थित होने के कारण एवं लोहे के पाये के कारण शरीर कष्ट, मानसिक तनाव व कार्यो में अडचने आएगी।
वृश्चिक राशि -  चन्द्रमा से शनि अष्टम स्थित होने के कारण ढैय्या चलेगी जो कष्टकारी रहेगी। ताम्र पाया शुभ है।
धनु राशि - चन्द्रमा से शनि पूज्यनीय रहता है। व्यवसाय व परिवार संबंधी विशेष चिन्ता रहती है। सोने के पाये पर शनि रहने से बनते कार्यो में रूकावट आती है।
मकर राशि - षष्ठस्थ शनि शुभ रहता है। चांदी का पाया रहने से शुभ है।
कुंभ राशि - पंचस्थ शनि शुभ माना जाता है, परन्तु चन्द्र से सप्तम भाव, एकादश भाव व द्वितीय भाव पीडित होने के कारण मानसिक तनाव, व्यापार में रूकावट व धन हानि की संभावना रहती है। लोहे के पाये में शनि अशुभ फलप्रद है।
मीन राशि - चतुर्थस्थ शनि की ढैय्या कहलाती है जो भाई-बन्धुओं से वैभनस्य पैदा करती है। कार्यो में बाधाएं आती है। चन्द्रमा पर दशम दृष्टि होने से मानसिक तनाव रहता है। ताम्र पाया होने से शुभ फलप्रद है।
1. शनि साढे साती, ढैय्या एवं अशुभ शनि पाया की शांति के लिए शनि के बीज मंत्र या वैदिक पौराणिक मंत्र का जप करना चाहिये।
2. शनि के दान में देने योग्य वस्तुएं : लोहा, अंगीठी, तवा, चिम्मटा, सरसों का तेल, काले तिल, काला कम्बल, काले जूते, काली जुराबे, काली भैंस या काली गाय अपनी काले उडद, सामथ्र्य के अनुसार दान दें।
3. प्रत्येक शनिवार को बन्दरों को गुड, चना या केले आदि खिलाये।
4. शनिवार को काले कुत्ते को तेल से चुपडी रोटी डालें।
5. काले उडद के लड्डू तिल के तेल में बनाकर कौओं को डालें।
6. सात शनिवार शनि के दिन से या शनि के नक्षत्र से आरम्भ कर काली भैंस को काले चने खिलाये।
7. सात शनिवार काले उडद के आटे की गोलिया बनाकर मछलियों को डाले।
8. 11 शनिवार काले कोयले लंगर में (जहाँ लोगों को मुफ्त भोजन कराया जाता है) भोजन पकाने के लिये सामथ्र्य के अनुसार दान दें।
9. घोडे की नाल का छल्ला बिना टांके के ही मçन्त्रत कर मध्यमा अंगुली में शुक्ल पक्ष में शनिवार के दिन धारण करने से शनि के प्रकोप में कमी आती है।
10. भगवान शिव या हनुमान की विधि पूर्वक पूजा करें। प्रतिदिन शिव सहस्त्र नाम या हनुमान चालीसा या हनुमान के 108 नामों का स्मरण करें।
11. भैरव की उपासना या चामुण्डा देवी पूजा उत्तम एवं शीघ्र फलदायक है। ऊपर लिखित किसी भी एक उपाय का दान दें। जप, पूजा व दान जातक के शुभ कार्यो को बढाकर पूर्व जन्मों के अशुभ कर्मो को कमकर जातक को कष्टों को सहने योग्य बना देते हैं।
सर्वे भवन्तु सुखिना:
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